खिन्न भिन्न से, क्यूँ नोचते हो ..
तुम सर के बेगुनाह ये बाल....
हार का सेहरा पहना है जो इस साल....
दबा दो माल गोदामों में,
पीयेंगे सिर्फ ये उबली दाल..
महंगाई खुद आसमान छू जायेगी...
तमतमायेंगे जनता के ये सुर्ख गाल लाल...
नारे फिर तुम भी लगाना...
चिल्लाना फिर तुम भी, गली२ डाल२...
"हाय ये महंगाई के लाल"....
अगला चुनाव जब आएगा...
जीतोगे तुम ही उस साल...............रामेश्वरी....
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