हे नादान पंछियों ..
कब तुम क़ैद से उड़ान पाओगे..
कब अपने हक के लिए, आवाज़ उठाओगे..
कब तक पराधीनता सजाओगे कंठ अपने...
कब इस कंठ से स्वतन्त्रता का नारा लगोगे ..
काट डालो ये जाल सारे, पराधीनता के..
दी क्यूँ ईश्वर ने ये पैनी चोंच तुम्हें...
कब तक इससे, बेदर्द इंसानी जार का ..
तुम गुनगुना कोयल की मधुर सी धुन...
आनंद रसपान इनके जीवन में भरोगे...
क़ैद पंछी ही रहोगे, जब तक तुम डरोगे...
कब तुम सोने के दानो से मूंह मोड़...
आज़ादी का सुखा दाना चुगोगे .......
अब तो सम्मान जगाओ नन्हे से दिल में अपने...
पर फैला दो इतने बडे, बहेलिये को भी पिंजरा छोटा सा लगे .........
आवाज़ में कर्कशता इतनी भरो, कान हुक्मरानों के फट जाए......
जीना हो मुहाल उसका, विवश वो पिंजरा खोलने पर हो जाए..........रामेश्वरी(मई दिवस पर)
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