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Saturday, May 26, 2012

वहशी निगाहों से


सामना करना चाहती नहीं...
जब जब...
उन वहसी आँखों से...
टपकती लार ऐसे थी..
जैसे इंसान नहीं हो वो..
हो इक  खूंखार आदमखोर...
बिन क़ैद भी उसकी निगाहों से..
तड़पन होती इक घायल पशु सी...
घायल  नारी ह्रदय मेरा...
ढके सभी अंग इस तन के ...
ढक कर भी नग्नता सी लगी..
जब जब सामना हुआ ...
उन वहसी आँखों का ...
बिन छुए तार तार करती थी  अस्मत..
निगाहें उन हैवान सी आँखों की...
हे खुदा, बदल निगाहें हवस भरी..
या जीवन ना दे हमें इक नारी का.......इक स्त्री की भावना जब जब कोई उसे वहशी निगाहों से देखता है.....

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