बिन सर्द हवा के भी...
कांप उठी थी ये रूह मेरी...
जब बीच सड़क देखि...
बेहोश लाचार सी..
फटे वस्त्र उसके...
किसी राक्षस की हवस की..
शिकार थी वो बच्ची...
उम्र अपरिपक्व ..
जैसे डाल पर इक कली कच्ची..
कुम्हार के घड़े की, सीली सी मिटटी ..
हैवान ने उसने खिलने ना दिया..
मांगे थे दो वस्त्र उसने...
ढकने काया अपनी..
शायद गुनाह उसने कर दिया
उसने उन्ही वस्त्रों में क्यूँ छेद था किया...
क्यूँ वहशी ने अपनी बच्ची और उसमे ..
भेद था किया...?
(क्यूँ इंसान अपनी बच्ची और दूसरी बच्ची में फर्क करता है, जिस दिन इंसान ये फर्क करना छोड़ देगा शायद दुनिया स्वर्ग होगी)
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