हर रोज निंद्रा में..
स्वपन के महल खड़े करते हैं हम...
द्वार, झरोखे खुले रखे हैं सब महल के..
ना जाने किस द्वार से तुम्हारा आना हो...
सोने नहीं देते हम तुम्हें पुकार २ कर...
कहीं अब यही तुम्हारा ना आने का बहाना हो...........रामेश्वरी
स्वपन के महल खड़े करते हैं हम...
द्वार, झरोखे खुले रखे हैं सब महल के..
ना जाने किस द्वार से तुम्हारा आना हो...
सोने नहीं देते हम तुम्हें पुकार २ कर...
कहीं अब यही तुम्हारा ना आने का बहाना हो...........रामेश्वरी
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