इन शहरों की भीड़ में ..
एकांत बहुत है...
इंसानियत की शुरुआत यहाँ कहाँ..
यहाँ उसका अंत ही बहुत है...
यहाँ भीड़ में दम सा घुटता है..
इंसानियत हर कोई लूटता है ...
यहाँ लहू किससे मांगोगे ..
यहाँ रगों में पानी दौड़ता है...
गिध्ह है बसे यहाँ बहुत...
हर कोई इक दूजे को नोचता है...
हर कोई अपनी ही सोचता है...
मानसिक रोग लगा हो जैसे...
हर कोई गैरों में अपनों को ढूंढता है.....
अविश्वास धोखा बसेरा करे यहाँ..
विश्वास जैसे अगवा हो स्वार्थ के हाथ ..
जिधर देखो आँखों में अविश्वास घेरता है...
हर कोई इक दूजे की आँखों में वही...
गुमशुदा सा विश्वास फिर से ढूंढता है.........
चेहरे बदल, कुरूप इतने हुए...
हर कोई सफ़ेद पावडर मुख पर लेपता है...
बना बहुमंजिला इमारतें यहाँ...
फिर भी हर कोई ख़ुशी ढूंढता है...
घर पाओगे खोजे से मुश्किल यहाँ..
यहाँ बस इंटों का जमाव दिखता है..
इंसानियत सांस लेगी कैसे...
हर कोई कब्र उसकी खोदता है...
शायद मसीहा बन इंसानियत ...
हो फिर पुनर्जीवित, कब्र से....................रामेशवरी

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