ढका हमने नेकी पर बदी का पर्दा, अपने ज़मीर पर ..
फिर भी वो कहते हैं अब, हम बेहया हो गए.......
पल पल लावा लिए सीने में, ज्वालामुखी सी बही मैं..
दे सितम अब वो कहते हैं, शीतल हो हम पत्थर दिल हो गए...
जमी थी धूल गम की बहुत, उन पर एक ज़माने से...
बनी झोंका हवा का, धूल संग ले जाने, वो कहते हैं हम बेलगाम से हो गए......
हर राह चली आगे उनसे मैं, चुभे न कोई शूल पग उनके...
आज वही कहते हैं, बदसूरत हैं ये पाँव मेरे,
घायल हुए न जो काँटों से, आज घायल वो उनके कठोर वाणी से हो गए....
पूजा उन्हें एक ईश्वर की तरह, बन कभी मीरा, राधा कभी....
आज वही कहते हैं, हम काफिर हैं, क्यूँ हम प्रेमिका से, जोगन हो गए.........रामेश्वरी
bahut sunder kavita.
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