मृत्तिका तले जब..
कोई बीज नयी कोपलें छोड़ता है..
जन्म देता इक नए पौध को...
निकट उसके माँ नहीं होती...
जंग तेज हवाओं से...
धूप के थपेड़ो से...
बारिश की बूंदों से...
स्वयं करता वो...
कभी कमर टूटती उसकी..
तेज पूर्वा से..
फिर सीना तानता वो..
चंद ओंस की बूंदों से...
शीतल हो...
सीखे कोई जीना इनसे..
संग इनके ना कोई सखा सहेली...
ऐ ईश्वर(प्रकृति) तेरी ये अज़ब पहेली...........रामेश्वरी..शु प्रभात मित्रों को...









