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Saturday, May 26, 2012

नयी कोपलें

मृत्तिका तले जब..
कोई बीज नयी कोपलें छोड़ता है..
जन्म देता इक नए पौध को...
निकट उसके माँ नहीं होती...
जंग तेज हवाओं से...
धूप के थपेड़ो से...
बारिश की बूंदों से...
स्वयं करता वो...
कभी कमर टूटती उसकी..
तेज पूर्वा से..
फिर सीना तानता वो..
चंद ओंस की बूंदों से...
शीतल हो...
सीखे कोई जीना इनसे..
संग इनके ना कोई सखा सहेली...
ऐ ईश्वर(प्रकृति) तेरी ये अज़ब पहेली...........रामेश्वरी..शु प्रभात मित्रों को...

वो बच्ची..

बिन सर्द हवा के भी...
कांप उठी थी ये रूह मेरी...
जब बीच सड़क  देखि...
बेहोश लाचार सी..
फटे वस्त्र उसके...
किसी राक्षस की हवस की..
शिकार थी वो बच्ची...
उम्र अपरिपक्व ..
जैसे डाल पर इक कली कच्ची..
कुम्हार के घड़े की, सीली सी मिटटी ..
हैवान ने उसने खिलने ना दिया..
मांगे थे दो वस्त्र उसने...
ढकने काया अपनी..
शायद गुनाह उसने कर दिया 
उसने उन्ही वस्त्रों में क्यूँ छेद था किया...
क्यूँ वहशी ने अपनी बच्ची और उसमे ..
भेद था किया...?
(क्यूँ इंसान अपनी बच्ची और दूसरी बच्ची में फर्क करता है, जिस दिन इंसान ये फर्क करना छोड़ देगा शायद दुनिया स्वर्ग होगी)

वहशी निगाहों से


सामना करना चाहती नहीं...
जब जब...
उन वहसी आँखों से...
टपकती लार ऐसे थी..
जैसे इंसान नहीं हो वो..
हो इक  खूंखार आदमखोर...
बिन क़ैद भी उसकी निगाहों से..
तड़पन होती इक घायल पशु सी...
घायल  नारी ह्रदय मेरा...
ढके सभी अंग इस तन के ...
ढक कर भी नग्नता सी लगी..
जब जब सामना हुआ ...
उन वहसी आँखों का ...
बिन छुए तार तार करती थी  अस्मत..
निगाहें उन हैवान सी आँखों की...
हे खुदा, बदल निगाहें हवस भरी..
या जीवन ना दे हमें इक नारी का.......इक स्त्री की भावना जब जब कोई उसे वहशी निगाहों से देखता है.....

Wednesday, May 23, 2012

उनके लिए क्या से क्या हो गए...

ढका हमने नेकी पर बदी का पर्दा, अपने ज़मीर पर ..
फिर भी वो कहते हैं अब,  हम बेहया हो गए.......

पल पल लावा लिए सीने में,  ज्वालामुखी सी बही मैं..
दे सितम अब वो कहते हैं, शीतल हो हम पत्थर दिल हो गए...

जमी थी धूल गम की बहुत,  उन पर एक ज़माने से...
बनी झोंका हवा का, धूल संग ले जाने, वो कहते हैं हम  बेलगाम से हो गए......

हर राह चली आगे उनसे मैं, चुभे न कोई शूल पग उनके...
आज वही कहते हैं, बदसूरत हैं ये पाँव मेरे, 
घायल हुए न जो काँटों से, आज घायल वो उनके कठोर वाणी से हो गए....

पूजा उन्हें एक ईश्वर की तरह, बन कभी मीरा, राधा कभी....
आज वही कहते हैं, हम काफिर हैं, क्यूँ हम प्रेमिका से, जोगन हो गए.........रामेश्वरी 


Thursday, May 17, 2012

ऊँची नीची पगडंडियों से..
जब जब सफ़र किया मैंने..
सीधी घर की राह पाई मैंने...
जब जब पग सीधी राह थे ..
ना जाने किसकी मंजिल थी वो.....
जिसे अपना बना बैठे.........
(रामेश्वरी)

बंद किताबों के पन्नो पर.

रख ले हमें भी...
बंद किताब के पन्नो पर...
गम की बरसात से सिले हैं अभी...
सहेज ले हमें, समेट ले हमें ..
अज़र कर देना हमें, रख पन्नो पर....
सुगंध हमारी रहेगी आँगन तेरे ..
जब जब पन्ने पलटोगे तुम...
साथ पाओगे मेरा जब २..
पढ़ोगे सुगंध से सने मेरे, लफ्ज़ तुम ...
मिट कर भी  अक्शहमारा मिलेगा..
उन बंद किताबों के पन्नो पर...........रामेश्वरी 

ये हमें क्या होता जा रहा है...
जिस भी गली कुचे से गुजरे हम...
हालत देख मेरी, बोल उठे दुनिया वाले ..
वो देखो, इश्क का अंजाम ऐसा होता जा रहा है..............रामेश्वरी

गर पता ढूंढो जो मेरा..

गर पता ढूंढो जो मेरा..
इस पते पर मेरे आना..
जहाँ हर गम की दवा हो..
बहती शीतल नीर और हवा हो...
जहाँ दुःख भी पहनते सुख का जामा हो..
जो भीड़ में भी अकेला हो...
जहाँ दोस्त भी उसका  दुश्मन सा हो..
ज़िन्दगी खड़ी दौराहा हो...
रिश्तों से मन जिसका उठा है..
जो सबसे जुदा जुदा है..
अन्तर आत्मा ही उसका खुदा है...
धुप लगे जिसे  छांव हो..
छालों में सने जिसके पाँव हो...
गुमशुदा जहाँ मुस्कान हो..
बस चल रही उसकी जान हो...
समझो सही ठिकाना आ गया..
देना एक दस्तक बस ..
उसके मस्तिष्क पटल पर..
सोयी है वो बहुत दिनों से ..
गम की आगोश में...रामेश्वरी 







Wednesday, May 16, 2012

वो बेरहम कितने हैं देखिये...
हुजुर जलाते भी रहे हमें...
और बुझाने आग जलन की ..
आंसू भी हमी से बहाने को कह गए............रामेश्वरी

main ram tum shabri

चले जहाँ जहाँ कदम...
सोचा उस डगर पग होंगे संग तुम्हारे...
चुन लेंगे सब शूल राह के..
होंगी यदि कुछ खट्टी मीठी यादें वहां...
चख लोगे तुम संग बैठ घने वृक्ष तले..
पर शायद हम ही राम न थे..
वरना तुम भी शबरी होतीं.....रामेश्वरी

नमकीन आंसू

लाख दबाये आंसू ये...
मीलों श्वेत बर्फ की गहराई में...
सोचा ये जम कर तो रुकेंगे...
कुछ पल को तो आंसू थमेंगे.......
पर इन आंसुओं की नमकीन गर्मी ने...
पर्वत भी पिघला दिए बर्फ के............
फिर पूरी ओड़ ली जैसे मैंने...
ये सफ़ेद मखमल रुई की रजाई ..............
शायद ये आंसू सांसों की ठंडक से जम जाएँ............
ह्रदय गति के साथ, गति आंसुओं की थम जाए................रामेश्वरी 

Tuesday, May 15, 2012

बहुत उछल रही थी उमंगें...
जकड बेड़ियाँ....
लगा ताला....
चाबी ईश्वर की और उछाल दी....
देता कुछ और ईश्वर...
ये क्या बवाल, इंसान में भर दी......रामेश्वरी
हर रोज निंद्रा में..
स्वपन के महल खड़े करते हैं हम...
द्वार, झरोखे खुले रखे हैं सब महल के..
ना जाने किस द्वार से तुम्हारा आना हो...
सोने नहीं देते हम तुम्हें पुकार २ कर...
कहीं अब यही तुम्हारा ना आने का बहाना हो...........रामेश्वरी

ज़िन्दगी की स्वेटर


इक फंदा उल्टा ..
इक फंदा सीधा...
यूँ बुनते गए हम...
रेशम की डोर से...
ज़िन्दगी की स्वेटर हम...
पर ये क्या हुआ?
इसमें हम ही समां पाए...
ज्यूँ २ नज़दीक आये..
तुम भी इस स्वेटर में समाये...
ये रेशम की डोर उधडती सी गयी.....
फिर इक फंदा उल्टा...
इक फंदा सीधा...
उधड़ता ही गया..........रामेश्वरी 

Monday, May 14, 2012

वो जो बहुत अकड़ा रहा करता था....
आज भी अकड़ा है, पर्र्रर्र्र्रर्र्र 
आज अकड़न भीतर उसके रक्त की शीतलता की....
आज जकड़न चहुँ ओर उसके, मौत की.........................रामेश्वरी
हर बार टूटते हुए तारों ने कहा मुझसे...
देखा न कर आसमान की ओर...
गर तुझमे हिम्मत ओर प्रकाश न हो....
बुझते तारों को तो ...
ये आसमान भी अपनी झोली नहीं देता...........रामेश्वरी

प्रेम सौदा

प्रेम कोई सौदा ऐ व्यापार नहीं..
दिया है तो लिया भी जाए...
हर कोई इसमें व्यापार क्यूँ खोजता है..

व्यापार किया जब स्वार्थ से...
फिर बेवफाई पर मूरख गिला क्यूँ करता है...
व्यापार कोई बा-वफाई से..
कोई बेवफाई से करता है......................रामेश्वरी
नैनो में भरो प्रेम, हवस नहीं..
रोशन ये नूर से ईश्वर के...
डारो इनमे तमस नहीं...
क्यूंकि ये आएना है इंसान के..
वयक्तित्वा का..
झलकता है सब इनसे...
नाश करो तामसिक प्रवृति का ..रामेश्वरी

इन शहरों की भीड़ में ..

इन शहरों  की भीड़ में ..
एकांत बहुत है...
इंसानियत की शुरुआत यहाँ कहाँ..
यहाँ उसका अंत ही बहुत है...

यहाँ भीड़ में दम सा घुटता है..
इंसानियत हर कोई लूटता है ...
यहाँ लहू किससे मांगोगे ..
यहाँ रगों में पानी दौड़ता है...

गिध्ह है बसे यहाँ बहुत...
हर कोई इक दूजे को नोचता है...
हर कोई अपनी ही सोचता है...
मानसिक रोग लगा हो जैसे...
हर कोई गैरों में अपनों को ढूंढता है.....


अविश्वास धोखा बसेरा करे यहाँ..
विश्वास  जैसे अगवा हो स्वार्थ के हाथ ..
जिधर देखो आँखों में अविश्वास घेरता है...
हर कोई इक दूजे की आँखों में वही...
गुमशुदा  सा  विश्वास फिर  से ढूंढता है.........

चेहरे बदल, कुरूप इतने हुए...
हर कोई सफ़ेद पावडर मुख पर लेपता है...

बना बहुमंजिला इमारतें यहाँ...
फिर भी हर कोई ख़ुशी ढूंढता है...
घर पाओगे खोजे से मुश्किल यहाँ..
यहाँ बस इंटों का जमाव दिखता है..

इंसानियत सांस लेगी कैसे...
हर कोई कब्र उसकी खोदता है...
शायद मसीहा बन इंसानियत ...
हो फिर पुनर्जीवित, कब्र से....................रामेशवरी 



Sunday, May 13, 2012

माँ

चोटें गर लगी हमें ..
रोता माँ को पाया हमने...

सोये जब जब सूखे में हम...
माँ को गिले में सुलाया हमने...
रातों को सुकून से निर्भीक सोये हम...
अपने हाथों को माँ ने झुला बनाया..
यूँ नींद को पाया हमने...

तप कर कड़ी धूप में थके जब २
माँ के विशाल सीने से लग ..
सुकून शीतल पाया हमने....
संघर्ष के गर्म थपेड़ों पर...
बरगद सा माँ को पाया हमने...


जाए कोई काशी, काबा ...
जाऊं क्यूँ मंदिर कोई?
घर में भगवान बसाया हमने ...
माँ के चरणों में ही ..
हर तीर्थ पाया हमने..


जोड़े कोई धन दौलत ..
हमने माँ के हर श्वेत अश्रू जोड़े हैं...
खपी, तोड़ हाड मॉस अपना..
उदर भरा हमारा...
आज वक़्त सेवा का आया..
हम शहर को दौडे हैं...
स्वार्थ भीतर बसाया हमने ....

कड़ी तपस्या की माँ ने...
और फल मीठा उसका पाया हमने ...रामेश्वरी 





कैसे रुसवा करूं..
इन आंसुओं को ...
गिरा उस इंसान की ..
बंजर धरती(दिल) पर...........
कोई कोपलें आज तक..
फूटी नहीं उस धरती पर.......
कितने सावन आये वहां..
आंसू बहाकर चले गए..
शायद ये वो बर्फीला टीला है ...
जो आज तक पिघला नहीं....
रामेश्वरी

(विरहन स्त्री का दर्द)


उड़ती धूल..
बहती गर्म लू में ..
सूखी धरती ...

उड़ते पात ..
है सूखी डाल तले ..
टकी निगाह ..

धुंधला भेष..
दूर पिया का देश
इन्तेजार बस...

जगाती आस
कहीं घोड़ों की टाप ..
मिलन जाप ......

मौत करीब ..
रेत करे दफ़न ..
आ ऐ रकीब ..

रामेश्वरी (विरहन स्त्री का दर्द)

Thursday, May 10, 2012

इंसान की परिभाषा..


इक हिरन का बच्चा और उसका उसकी माँ से सवाल 
माँ इंसान कैसा होता है?...
बेटा बस  लोमड़ी से थोड़ा चालाक ..
हाथी से भी ज्यादा जिसकी भूख...
शेर से भी पैनी जिसकी वहशी निगाह...
मगरमच्छ भी जिसके अभिनय से रो पड़े...
गंगा भी जिसको  नहलाने धरती पर उतर पड़े..
गिध्ह की तरह जो इक दुसरे को नोच खाता है..
गिरगिट की तरह रंग बदलना जिसे आता है ...
अब समझ लो बेटा वही इंसान कहलाता है...........रामेश्वरी 

Sunday, May 6, 2012

आम आदमी,राजनीति,

आम आदमी को बना आम..
रसीले मेहरबान खुद बने हैं..
कैसे कहें इस देश के नेता ..
अब महान कैसे कैसे बने हैं? 

कोई चिर निंद्रा सोता वहां..
कोई खोया रंगीन चलचित्र में..
जब कुछ और न मिला तो...
दो प्रतिस्पर्धी नारियों को ..
मनोरंजन को वहां बैठा दिया ...
अब रंगीन चलचित्र नहीं..
सीधा प्रसारण देखेंगे ...

दबा सड़ा कर अनाज गोदामों में ..
खुद चारा भी चर जाते हैं..
आम आदमी की आम ज़िन्दगी ..
क्यूँ चखेंगे वो...
आम आदमी बस फुटपाथों..
में फेंके जाते हैं ...
अब तो राखी सावंत को भी ..
संसद में सम्मानिये न्यौते भेजे जाते हैं ...
आम आदमी के घरेलू झगडे टीआरपी पाने को..
सारे आम किये जाते हैं...
बड़े बड़े घोटालों पर नकाब किये जाते हैं..
बड़े बड़े दबंग अब जेलों में कहाँ..
वो तो संसद में भेजे जाते हैं..
राजनीति, राजनीति कहाँ ..
बस गलत नीतियों का राज है...
अब कैसे कहें कैसे कैसे..
महानुभावों के ताज सजाये जाते हैं............रामेश्वरी

Saturday, May 5, 2012

लेखनी जब तुम लिखो

लेखनी जब तुम लिखो, रोशनाई से अपनी..
सच  उजागर करते गीत लिखना...
ना दिन को रात, रात को दिन लिखना...
भारत की बेटी हो तुम, है तुम्हें एहसास सब..
नारी की ह्रदय पीड़ा लिखना, ह्रदय उसका विशाल लिखना ..
सौन्दर्य बसता यहीं है, यहाँ की सादगी, भोलापन लिखना..
वीर वीरांगनाओं की जननी है ये, इस माता की गौरव गाथा लिखना..
हुए कई कपूत भी यहाँ, उनकी अस्मत पर धित्कार लिखना ..
माँ के गोद में, प्रतिदिन हत्या होती बेटियों की..
अस्मत बेमोल लूट रही, माँ है शर्मसार लिखना...
गूंगी अब उसकी जुबान लिखना..
जो लिखा ना सको, अपनी रोशनाई को बस स्याही लिखना...
लिखो तो बस देश का  गौरवमय इतिहास लिखना..रामेश्वरी 

Friday, May 4, 2012

वो ज़रूर देगा ..

जब तलक रूह में, वो हमें ईमान देगा...
बुराई से,खौफ से लड़ने का साजो सामान देगा..
हाथों में शमशीर ना सही, कलम को हमारी म्यान देगा ..
जुबां पर पैने तीर ना सही, उस पर इक कमान देगा...
दिलों में सम्मान, उड़ने को हमें खुला सा आसमां देगा...
लड़ना है दूर तलक, इस दफा अच्छाई को पुष्पक विमान देगा..
साथ कोई हनुमान ना सही, किष्किन्धा सी आवाम  तो देगा ...
दामन रहे पाक साफ़ इस दलदल से, ऊँची वो मचान देगा ...
घुटन है हर सीने में अब,  कब वो बेजुबानों को जुबां देगा ...
दो जून रोटी खा सके सुकून से हम, बस कब हमें वो ये इत्मीनान देगा ...............रामेश्वरी 

Tuesday, May 1, 2012


विलीन हो जाऊं तुझमे...
ज्यूँ दरिया में नील रंग...
दिखूं बस सग्र जहाँ को..
बहे दरिया जब मेरे संग....
हाथ किसी के ना आऊं...
बनूँ वो पवित्र रंग...
जो मुठी भर, जल भर,
छूना चाहे जो मुझे, रहे दंग...
हाथों से फिसल मैं फिर दरिया संग..............रामेश्वरी

व्याकुल से थे हम, चंद लफ़्ज को..
वो पूरा ग्रन्थ ही सुना गए....
सोचा प्रारंभ सुनेगे अपनी कहानी का...
वो बावरे सईयाँ हमें सीधे अंत सुना गए....
(रामेश्वरी)
हे नादान पंछियों ..
कब तुम क़ैद से उड़ान पाओगे..
कब अपने हक के लिए, आवाज़ उठाओगे..
कब तक पराधीनता सजाओगे कंठ अपने...
कब इस कंठ से स्वतन्त्रता का नारा लगोगे ..
काट डालो ये जाल सारे, पराधीनता के..
दी क्यूँ ईश्वर ने ये पैनी चोंच तुम्हें...
कब तक इससे,  बेदर्द इंसानी जार का ..
तुम  गुनगुना कोयल की मधुर सी धुन...
आनंद रसपान इनके जीवन में भरोगे...
क़ैद पंछी ही रहोगे, जब तक तुम डरोगे...
कब तुम सोने के दानो से मूंह मोड़...
आज़ादी का सुखा दाना चुगोगे .......
अब तो सम्मान जगाओ  नन्हे से दिल में अपने...
पर फैला दो इतने बडे,  बहेलिये को भी पिंजरा छोटा सा लगे .........
आवाज़ में कर्कशता इतनी भरो, कान हुक्मरानों के फट जाए......
जीना हो मुहाल उसका, विवश  वो पिंजरा खोलने पर हो जाए..........रामेश्वरी(मई दिवस पर)