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Sunday, April 5, 2015

कल और आज

आज भी 
अकाल है, बाढ़ है 
भूखे बच्चे हैं 
भूख है 
लाचार माँ है 
सूखे खेत हैं
खलियान हैं
पर वो लंगड़ा बाप नहीं

मय हैं
मयखाने हैं
हर ओर शराबी बाप कहीं ।
अब ना हल है
ना वो कल है
ना वो मदर इंडिया
गली कूंचे वेश्यालय  

 हर कहीं ॥ 

क्षणिकाएं ( एक कोशिश )

सड़कें वहीँ रहती हैं, 
प्रदर्शनकारी बदल जाते हैं । 
डंडा वही , पटवारी वही, 

कुछ नए , घाव उभर आते हैं । 
मंच वही, खादी वही, 

ऊँचा स्वर, भाषण वही... 
समानांतर एक बात, 

सबके वादे बदल जाते हैं ॥ 

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कल था इश्क़, 
आज है इश्क़, 
कल होगा इश्क़,
रहता इश्क़ अमर, 

गर रोशन है इश्क़
फिर क्यों गुप नफ़रती अँधेरा है 
हर सांवरा कन्हैया है,
हर गोरी राधा है

कयूँ गौर वर्ण बिन प्रेम आधा है 

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मेरी बगिया में
गुलाब नहीं खिलते 
फिर जाने क्यों
किसकी हिफाजत को 
कांटे उग आये हैं । 



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माँ की गोद से उठे 
रेंगते रेंगते 
फिर खड़े हुए । 
अब गिरते गिरते 
ईमान से न गिर इंसान 
रेंगने वाले प्राणी 
धरती पर अपनी सीमायें 
बाँध लेंगे । 


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उसकी महक 
अपनी फुलवारी में 
बिखरायी जब से । 
कैक्टस मेरे 
अब गुल खिलाने लगे हैं 
जड़ें वो छोड़ते नहीं 
अब इधर उधर 
शायद अपनी कीमत 
जताने लगे हैं । 
(रामेश्वरी )

॥ रामेश्वरी

Friday, April 3, 2015

वो मुफ़लिसी में,  मेरा  कुछ यूँ  मददगार था । 
हाथ खाली थे उसके,  गले मोहरों का हार था ॥ 

जग कहता मीठी जुबां करो,  सच्चाई से उन्हें क्यों इंकार था । 
वो खंजर जुबां पर रखते हैं,  हमें यूँ बार२ मरने से इंकार था ॥  

लटें बिखरी बिखरी उसकी,  चेहरा पसीना सरोबार था । 
आलन मेहँदी उसकी, माँ है ना, यही उसका श्रृंगार था । ।  

रामेश्वरी शुभसंध्या दोस्तों