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Tuesday, May 31, 2011

जी करता है...
मै भी,
रोड पर बैठ केले बेचूं..
( अपनी पास कहाँ, किसी मर्ज का इलाज है!!! ?)
भरी दोपहरी में..छत्री के नीचे बैठ..
अन्ना या बाबा की तरह सोचूं...
कर लूं , किसी ज्वलंत मुद्दे पर भूख हड़ताल ,
मच जाए जिसके कारण , विश्व भर में बवाल..
कुछ तो चलेंगे मेरे पीछे भी.. भेडचाल... DEEPAK PAHALWAN

Monday, May 30, 2011

bachchi.ek sawal


क्यूँ मेरे जन्म होने पर मचा घर पर बवाल है..
नन्ही सी परी के आँखों में भी जैसे उठा यही सवाल है...
कुछ दिनों रहूंगी बाबूल तेरे आँगन में..
कितना अन्न में खाऊंगी..
कुछ बरस बाद तो पराया धन ही कहलाऊंगी 
पुत्र जन्म में मचा कितना धमाल है..
वृधा वस्था में कर देते वही बेहाल हैं.. 
माँ की पीर समझू मैं..
स्वयं इक माँ बन जाऊं जब..
किन्तु पिता बन कर भी पिता की पीर..
समझेगा पुत्र कब ?
सुन ऐ गुलफाम ...यह गुलशन  गुल बिना सुना है ..
जन्म लेने दो मुझे ...
क्यूँ इतना बवाल और रोना है..
मुझ ही से महका घर का कोना कोना है...

Tuesday, May 24, 2011


जब तू ना था  ज़िन्दगी  उधार  सी  थी
नदी  की जैसे  चुपचाप  बह  रही  धार सी  थी ..
जब  तू  न  था .........................

जब तू ना था ज़िन्दगी वन में खिला इक फूल थी 
ह्रदय में चुभन देने वाली  दिन रैन वो शूल सी थी ..
जब तू ना था ............................


जब तू ना था ज़िन्दगी ज़िन्दगी ही ना थी........
ज़िन्दगी को जीने की तमन्ना ही कहाँ थी.......

आज  फिर  से  स्त्रियों  से  सूरज  ने  मुख  फेरा  है ...
जब  सूरज को  बदली , प्रकृति , हवा  ने  घेरा  है ...

नाराज  न  हो  सूर्य  देव  कल  आपकी  बारी  होगी ..
सुबह 2 जब  फिर  आपकी  पूजा  की  तैयारी  होगी ..


कल पहले पहर इन सहेलियों में फूट पड जायेगी ..
सभी  फिर से अपनी 2 राह मुख फेर चली जायेंगी ..

प्रकाश तुम्हारा उदीयमान  होगा. 
जगमगाता फिर यह जहाँ होगा .

Monday, May 23, 2011




खेलों  में  खेल   है  इक  खेल  ज़िन्दगी ..
कभी  तुम  मारो  हमें  इक  दुःख  का  कंकड़ .
हम  मारे तो   वो  दरिंदगी ..

इस  पार  कभी  हार (दुःख ) है  उस  पार  कभी  जीत ..(सुख )
जब  तक  इस  खेल  के  खिलाडी  हैं  निभानी  होगी  रीत ..

प्रीत  की  गेंद  बनाकर  फूट बाल  कभी  खेला  है ..
और  कभी   शतरंज  का  सिर्फ  पियादा  बन  गयी  ज़िन्दगी ..
 
और कभी ताश के पत्तों के घरोंदो सी दह जाय ये ज़िन्दगी 

ज़िन्दगी   की  इस  लड़ाई मैं  शहीद  भी  हुए  तो शहीद  न  कहलायेंगे .
यह  वो  शहादत  होगी i जिसमे  शायद  सभी  ख़ुशी 2 अश्रू  बहायेंगे ...


कभी  काँटों  में  खिला  फूल  लगी  ज़िन्दगी
कभी  राह  में  पड़ी एक सिर्फ  धुल  ज़िन्दगी .

मुठी में पड़ी गर्म  रेत  सी  फिसलती  ज़िन्दगी
नदिया  सी  तेज  बहती  ये  किनारा  ज़िन्दगी ..

Saturday, May 14, 2011

hawa


kaha chupke se is bahti hawa ne..
ab mera swaroop kya hai..

bahati thi kabhi main bhagat singh ke khoon main azadi ka junoon ban.
aur bahi kabhi main ek garibi ban Naagarjun ke kalam main sayahi ban.
aur bahi kabhi main sangeet ban sur ban taansen ke swar main lahri ban.
bahi kabhi kabhi main gaddaron ke khoon main ek gaddari ban.....

ab mera rookh ulta kyun hai..
ab bahati hoon main netaon ke khoon main, bharastachar ban.
aur bah rahi hoon hindu muslim main ek nafrat ban..
bah rahi hoon ameeron ki tijori aur garibon ki bhukh ban.
bah rahi hoon gali gali ek dushasan ban..vastra banate phir bhi nanga hai tan.

meri wo sheetalata kahan gayi..
jab se yah lalach aaya..meri tou disha hi gayi...

neta


कभी  देखा  है ...........
सूखे  तालाब  में  नाव  चलते 
सूखे  पेड़  पर  फूल  फल फलते 
सूखे  नदी  नालो  में  पानी  चलते 
धरती और  आकाश को भी मिलते 
कभी  देखा  है ............
फिर  कैसे  देखोगे  नेताओ  को  सच्चाई  की  राह  चलते ....
जब  सूखे  तालाब  हरे  हो  जायेंगे .........
टेडी दूम वाले कुते भी सीधे हो जायेंगे .
सूखे  पेड़  हरे  हो  जायेंगे .....
सुखी  सरस्वती पानी से लबालब भर जाएगी 
किसी  शितिज  पर  धरती  और  आकाश  मिल  जायेंगे 
समझो  उस  दिन   नेता  सुधर  जायेंगे ..............

Friday, May 13, 2011

सावन जल्द ही आएगा

सूर्य  देवता पूरे  जोश  से  उदीयमान  है
धरती  का  भी  अब  बड़ा  तापमान  है 

हमारी  स्तिथि  अब   पपीहे  समान है 
आसमान  को  देख देख बचे  प्राण  है 
बच्चे  और  बुडे सब यहाँ  परेशान है


इस  सुखी धरती पर कब काली बदली छाएगी 
कब बरखा की बूंदे धरती के कलेजे में समाएगी 

छम छम मोर नाचेंगे कब
कोयल गुनगुनायेगी..
पपीहा प्यास बुझाएगा .कब
बगुला  तपस्या पर जाएगा.
बरखा में भीगेंगे सब 
गर्मी दूर भगाएगा 

जयेस्था महीना बहुत सताएगा 
पर वो सावन जल्द ही आएगा.
पर वो सावन जल्द ही आएगा







apna

कभी अपनों के चेहरों में अनजान शख्स झलकता  है 
कहीं सब बेगानों में अपनापन झलकता है ये खुदा.


किसे कहे अपना और किसे हम माने यहाँ बेगाने हैं
दो बोली का फासला है जो बोल दें उन्हें ही जाने हैं


सही और गलत का फरक दें हमें ऐ खुदा
यही दुआ है अपना न कोई था न हुआ है ..

स्वार्थ से परे कोई दुनिया बना  तेरे हाथ में सब है खुदा
जहाँ माँ बेटा, भाई और भाई न हो स्वार्थ में कभी जुदा 
ख़ुशी मेरी  मज़ार  पर  रोई  न  होती . .
दुःख  य़ू  खिलखिला  कर  हंसा  न  होता

 
गर...................)))))))))))))))))))

एक  रुपैया  इमानदारी  से कमाया होता.
आज मैं अपनों से यूँ तो पराया न होता ..

इतनी गहरी नीद सोया क्यूँ.
आज इस कब्र मैं तनहा लेटा न होता.

Tuesday, May 3, 2011

gaon


गांव के गदनो में प्रेम की मिठास थी.
सर.र्र्र्रर्र्र्र बहती हवा में चीड की सुगंध थी.
झाड़ियों में कंदेली की सिरहन थी.

नन्हे बच्चों की आँखों में पिता के आने की आस थी.
मरती माँ की जैसे बेटे से मिलने को अटकी सांस थी.

सुख रहे हैं खेत सभी के, बंझर खेती पहले कहाँ थी.
बोली में मिठास सभी के ऐसी कडवाहट पहले कहाँ थी

उजड़े गए हैं पारंपरिक घर हमारे ईटों की दिवार है...
मसक बाज का संगीत कहाँ है हुआ दीजे का वार है..

गांव से निकलते ही पीछे इक सिसकती माँ की आवाज़ है.
बच्चों का रोना .पत्नी की दबी विरह वेदना की आवाज़ है

माँ पत्नी बच्चों का इक ही सवाल है..
फिर कब आओगे, फिर कब आओगे .
यही उनकी सिस्काती रोती पुकार