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Monday, May 30, 2011

bachchi.ek sawal


क्यूँ मेरे जन्म होने पर मचा घर पर बवाल है..
नन्ही सी परी के आँखों में भी जैसे उठा यही सवाल है...
कुछ दिनों रहूंगी बाबूल तेरे आँगन में..
कितना अन्न में खाऊंगी..
कुछ बरस बाद तो पराया धन ही कहलाऊंगी 
पुत्र जन्म में मचा कितना धमाल है..
वृधा वस्था में कर देते वही बेहाल हैं.. 
माँ की पीर समझू मैं..
स्वयं इक माँ बन जाऊं जब..
किन्तु पिता बन कर भी पिता की पीर..
समझेगा पुत्र कब ?
सुन ऐ गुलफाम ...यह गुलशन  गुल बिना सुना है ..
जन्म लेने दो मुझे ...
क्यूँ इतना बवाल और रोना है..
मुझ ही से महका घर का कोना कोना है...

3 comments:

  1. dhanaywad chamoli ji..jo dil se mahsoos karti hoon wahi likhti hoon

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  2. बहुत खूब रामेश्वरी जी ... आपको लेखन के क्षेत्र मे उतरते देख कर बड़ा हर्ष हो रहा है । बहुत शुभकामनाए

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