सूर्य देवता पूरे जोश से उदीयमान है
धरती का भी अब बड़ा तापमान है
छम छम मोर नाचेंगे कब
कोयल गुनगुनायेगी..
धरती का भी अब बड़ा तापमान है
हमारी स्तिथि अब पपीहे समान है
आसमान को देख देख बचे प्राण है
बच्चे और बुडे सब यहाँ परेशान है
इस सुखी धरती पर कब काली बदली छाएगी
कब बरखा की बूंदे धरती के कलेजे में समाएगी
छम छम मोर नाचेंगे कब
कोयल गुनगुनायेगी..
पपीहा प्यास बुझाएगा .कब
बगुला तपस्या पर जाएगा.
बगुला तपस्या पर जाएगा.
बरखा में भीगेंगे सब
गर्मी दूर भगाएगा
जयेस्था महीना बहुत सताएगा
पर वो सावन जल्द ही आएगा.
पर वो सावन जल्द ही आएगा
अच्छी कविता है. एक दो छोटी मोटी त्रुटियां रह गई हैं. जैसे स्थिति -स्तिथि,बूढे़ - बुडे़, ज्येस्ठ - जयेस्था, जेठ भी चलता. सूखी धरती का तो सुखी धरती बन गया, यह सब transliteration की वजह से होता है पब्लिश करने से पहले एक बार देख कर सही कर लेना चहिए.
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