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Thursday, July 19, 2012

बुने थे फंदे .
इन रिश्तों के ..
बडे हुनर से मैंने...
अब लगता है कभी २.
धागा ही शायद कच्चा था .....
चार दिन ओढ़ न सके..
शिथिल पड़ी दुनिया में...
शीतलता पड़ी रक्त में अब..
सिलायियों का मगर रिश्ता सच्चा था... .रामेश्वरी

चुभन बहुत है ..

चुभन बहुत है ..
इन फूलों के स्पर्श में...
डरती हूँ इन फूलों से ...
खिले हैं जो...
सींचे थे जो..
स्वार्थ के गर्त में...
स्वर्ण गुलदानो में ...
स्वर्ण आभा ले बैठे..
खिल स्वर्ण गुलदानो में..
खुशबू मगर स्वर्ण ..
कभी दे सकता नहीं....
कोमलता है कोसो दूर ..
..रामेश्वरी ..

Sunday, July 15, 2012

मेघ .

पवन वेग ..
नीर भरे हैं मेघ ..
हैं सूखे नैन ....

मेघ घनघोर ..
मचाये घना शोर ..
ढुंढे है ठोर ...

मोह कामिनी ..
गरजती दामिनी ...
दौड़े यामिनी ....

हर्षे मयूर ..
माटी सुगंध दूर२...
जल भरपूर ...

वृक्षों पे कांति...
पपीहे पीड़ा शांति ...
ज्यूँ धरा क्रांति .....रामेश्वरी ...इक हायकू बनाने की कोशिश मात्र...








Friday, July 6, 2012

कभी कभी सुन्दर वास्तु की रचना करने वाला खुद कुरूप होता है...
भिन्न२ और विभिन्न रंगों के पुष्प खिलने वाला माली भी सुन्दर हो ज़रूरी नहीं...
हाँ उसकी मेहनत सुन्दर है, उसका संघर्ष जो उसने उन पौधों को बड़ा करने में किया वो खूबसूरत है|
आकाश नीला है और नीला है रहेगा...पर जब वो इन्द्रधनुष की रचना करता है, या बदलियों को विभिन्न रूप देता है वो बहुत खूबसूरत बन जाता है|
सो मित्रों अपने रंग रूप पर इतराओ ना..कर्म ही सुन्दर है||..........रामेश्वरी
ज़मीर है मुझमे अभी भी..
कन्धा लेना पड़े दुश्मन का कभी भी..
मंज़ूर नहीं ये मर कर भी कभी ....
गैरत इतनी है दुश्मनो अब भी ...
छूना न जनाज़ा मेरा, सांसें चल पड़ेंगी कभी भी..........रामेश्वरी
गम भी दूर भागते हैं हमसे, कह कर अब तो यही...
जा हमसे दूर ठिकाना बना, मेरा ताउम्र का साथ नहीं....रामेश्वरी .शु प्रभात मित्रगन ...
बेशक ज़िन्दगी में खुशियों के दूर ही होते ठिकाने हैं...
जो बसेरा कर दिखा दे वहां, उन्ही के होते अफ़साने हैं....रामेश्वरी
कब तक ऑंखें मिलाते हम, इन वीरानियों में...
कह गए हकीम बड़े, हरियाली चाहिए इन आँखों को भी.......रामेश्वरी
डाका ना डाले कोई, कीमती साजो सामान समेट रखा तिजोरी में..
चुरा ना ले कोई ख्वाब मेरे, समेटूँ कहाँ इन्हें, रखूँ किस तिजोरी में .........सुप्रभात फ्रिएंड्स
किसी की दी हुई नफरत को इक सुगन्धित हवा समझ कर उड़ा दो....और किसी के दिए प्रेम को सहेज कर रखो जैसे कोई ग्रन्थ ......ज़िन्दगी हलकी महसूस होगी....रामेश्वरी
कम पानी में परछाई बनती है हमारी..
कभी देखा है सागर में अपनी परछाई को..शायद नहीं.......होती.

Thursday, July 5, 2012

ये शमशान कैसा है, कहाँ हम इन मुर्दों की भीड़ में खो गए...
शांत पड़े थे अर्थी में, दुश्मन सभी, कैसे हमें मरकर भी मरने को भीड़ में छोड़ गए....रामेश्वरी
संतों के बोल..
किन्नरों के ढोल ...
मौनी का मौन ..
को असत्य कहता है कौन ?

किसी का अहंकार ..
सच पर प्रहार ...
मिथ्या जय जय कार ..
को सहता है कौन?

बेसुरा तान ..
झूठी आन बान शान...
तीखे वाणी बाण...
को सुनता है कौन ...

रामेश्वरी
जिह्वा काट दी है उन खवाबों की...
जो अक्सर तेरा ही नाम पुकारा करते थे.....
ख्वाब गूंगे ही अच्छे ...
करते नहीं सिफारिश किसी के आने की.......रामेश्वरी
बिखरा हूँ मैं इतने कणों में, जितनी मरुस्थल में बिखरी है रेत..
डरता हूँ, कहीं से कोई दरिया आ बहा ना ले जाए खुद में समेट.....रामेश्वरी 
जब से खुद को सामान का दर्जा दिया...
कितने ही खरीदार हाट लिए खडे हुए...
जब से कहा खुद को जीता जागता इंसान...
सारे रिश्ते ही लगे जैसे सोने पे तांबा जड़े हुए......रामेश्वरी ..
चलो इश्क की गहराई नापते हैं...
दरिया ढूंढों जो बेतहाशा तेज धार हो...
मटके में छेद कर जतन करो पार लगने की...
देखें हम भी कितने आशिको के दिल कांपते हैं ..............रामेश्वरी
सोयी कलम की निन्द्रा को...
खून के छिंटों से जगाया है मैंने.....
चौंक कर जागी कलम मेरी...
लिखूंगी जो तू कहेगी हाथों से अपने ...
अभी रोशनाई भी भरवानी है मैंने.........रामेश्वरी
अंकुर फूटने लगे हैं शाखाओं पर..
फिर से होगी बहार इस गुलशन में 
बस हरित पात बनने की देरी है..
फिर भी गमसुम सा क्यूँ ये गुलशन है ...
ये शांति साँझ की है, या ये सबेरे की है...
समझ आता नहीं, ये शांति किसने बखेरी है..
ये गुनाह फिजा का था, या ये दरियादिली सावन ने बिखेरी है...
.....रामेश्वरी
चलते २ बादलों संग, भीगते2
इक लम्बी सी डगर पर .
बारिश की बूंदों से यूँ ही इक ..
चलती सी मुलाक़ात हुई थी...
ढेरों न सही पर कुछ बातें हुई थी...
ए बूंदों धन्य हो तुम, दोस्ती तुम्हारी ..
आँचल में छिपा लेते हो तुम व्यथा हमारी ..
दुनिया कहे लाख, कैसे रोते हैं हम...
इन आंसुओं को हमारे, कैसे खुद में ...
ढांप लेते हो तुम,,,
इसी बहाने, तले आसमां, जी भर रो लेते हैं हम ...
और दुनिया समझे, ये बूँदें हैं बारिश की..
गर्द ज़मी है सीने में जो, उसे तुझ से ही धो लेते हैं हम.........रामेश्वरी
दरदर भटक कर भी या खुदा कोई दर ना मिला...
दर मिला भी तो उस दर की दरो दिवार से खुद वो दरकिनार सा मिला..
(.रामेश्वरी शु प्रभात सभी मित्रों को....)
वो सोचते हैं, सागर भर देंगे रो रोकर जहां २ बंजर होगा ...
गर सागर रोया तो सोचो क्या मंज़र होगा.....रामेश्वरी
हमने तो वक़्त से थोड़ी सी फरमाइश ही की थी....
क्या जानते थे हम, वक़्त ने आजमाईश हमारी की थी.........
हमें रोकने की वक़्त ने नाकाम कोशिशें की थी...
उलटी सुइयां घुमा कर घडी की, 
वक़्त दुनिया का बदलने की नासमझी हमने भी की थी...............
.रामेश्वरी
जहाँ तक चली डगर पर...
हर मोड़ पर इक निशाँ छोडती गयी...
सोच लौटने में होगी आसानी मुझे...
पर वक़्त पीछे हर निशाँ मिटाता गया...
शायद आजमाने मुझे........
अब पकडूँ डगर कौन सी, सामने चौराहे खड़े........
.रामेश्वरी ...सु प्रभात सभी मित्रगनो को
जहाँ पुष्प खिलेंगे वहां कांटे भी चुभेंगे...
बस अब दौर ये है की कांटे भी फूल पर हक ज़माने लगे हैं ....
एक दौर था संग जमाने के चलना, अब हर कोई ज़माने से आगे चलने लगे हैं............रामेश्वरी
सिसकियाँ भरी हैं नारी के वजूद में...
कुछ सिसकियाँ दरवाजा लांघ न सकी....
जिन सिसकियों ने लांगा मर्यादा का दरवाजा..
कूरूरता हावी समाज की उन पर कितनी हद तक..
नहीं पुरुष समाज को इसका अंदाजा.........रामेश्वरी
सांप अक्सर अपनी राह में खतरा होने पर डसता है...
पर इंसान, हर किसी को डसकर सफलता कि राह चुनता है....रामेश्वरी (पेरसोनल एक्स्प.)
सांप का विष जिह्वा तले है और इंसान का जिह्वा पर.............
वो अक्सर कहते रहे, कि ऐतबार करना बुरा है...
हमने कहा ऐतबार बुरा नहीं बार २ करना बुरा है.......रामेश्वरी
कांटे दार पौधे कक्ट्स भी कभी कभी फूल खिला कर यह साबित करता है कि वो दिल का बुरा नहीं,...कांटे बस उसका अस्तित्व मात्र है...वो भी फूल खिलाना चाहता है....आत्मा उसकी नेक है...रामेश्वरी
ना धनवान की सुन ..
ना कर्ज़दान की सुन...
ना ऊँचे रसूख वालों की सुन .
ना ऊँचे मकान वालों की सुन ...
ना तंत्री, ना संत्री की सुन, ना मन्त्री की सुन ...
बस मानसून ..
तू इक किसान की पेट की सुन...
तड़पते प्यासे पंछियौं की सुन...
गरीबों के खनकते कनस्तर की सुन...
रहने सेठों के बनाते महलों के, धूप में झुलसते..
मजदूर के बदन की सुन...
तड़पती बिन पानी, मछली की सुन...
आहें भरती हर हर गंगे माँ की सुन...
क्यूंकि बिन पानी सब सुन...................रामेश्वर
आज मेरे झरोखे से झांक रहा है चंदा...
कुछ निर्मल सा चेहरा लिए..
सोचती हूँ गले के हार में पिरो लूं उसे...
या सजाऊँ अपने जुड़े में उसे...
या सिरहाने तले अपने रखूँ उसे...
कहानी सुनूँ उनसे जब२ निंद्रा आने लगे....रामेश्वरी
मैं वो खोटा सिक्का हूँ, जिसका पहलु एक ही रहा...
फिर भी लालच गया नहीं, लोग मेरी कीमत जांचते रहे......रामेश्वरी

काटो उतनी ही फसल, जितनी आपने ईमान से बोई हो...
पराये अन्न पर डालो ना नज़र, चाहे लाख चाशनी डुबोई हो............रामेश्वरी

बिक रहे हो गर छप्पर कहीं...
हम भी अपना आशियाना बना लेते...
चाँद तारों से गर ना सही तो ना सही...
उनकी मीठी सी मुस्कान से आशियाना सजा लेते..........रामेश्वरी
ठान लिया था हमने, अब ना रुख करेंगे कभी, उस गली का यारों...
बड़ी ही मोहब्बत से जहाँ, चैन ओ सुकून पर डाका डाला जाता है यारों 
पत्थर मारूं कि फूल मारूं..
हम दोनों को ही करीब रखते हैं..
मार कर बस मालूम हो जाए ..
कि वो भी भीतर जुबान रखते हैं............रामेश्वरी
इसी कशमकश में ज़िन्दगी कट गयी ..
ताउम्र कशमकश होती है क्यूँ...
जो ना हो कशमकश ज़िन्दगी में यूँ..
तो भी ज़िन्दगी खुद कशमकश होती है क्यूँ ?...रामेश्वरी
नारी तू अपने ही अस्तित्व से आज तक क्यूँ अनजान है ?
मिटाकर अस्तित्व तेरा, कहती ये दुनिया कि तू महान है ..रामेश्वरी
लोग भी कैसे कैसे उसूल निकालते हैं...
निगाहें वहशी हवस भरी उनकी..
बेशर्मी वो करें, पर्दा हम पर डालते हैं ....रामेश्वरी
कुदरत भी रंग समय समय पर बदलती है, बदलती आई है..
हम ने बदली रंगत गर, तो क्या अनोखी कयामत आई है........
ऐ बादलों गरज कर आकाश में ..
दिखा दो क्रोध तुम्हें भी आता है..
प्रेम में आंसू बहते तुम्हारे भी हैं..
और बरसना तुम्हें भी आता है...
गम दो ख़ुशी लो, कहा था किसी ने...
क्या मालूम था उसका गम हमारे खुश रहने में था.
ठहरी थी इक ही जगह पोखर और तालाब की तरह...
जमी थी सोच पर काई, सदियों से वही सड़ी गली सी ..
इक सागर ने अपने विशाल आकार और सोच से मुझे..

टेडी मेडी राहो पर बलखाकर, किनारों से टकराना सीखा दिया...
गंद समग्र दुनिया का पीने वाले ने, पवित्र हमें बनना सीखा दिया.........रामेश्वरी
जब भी लहर इक हवा की बह कर ..
मेरे करीब से गयी....
शायद यही मेरे कानो में फुसफुसा कर ...
वो यूँ गयी...
शीतलता चपलता दूँगी अपनी मगर...
अपनी आवारगी से दूर रखूंगी तुझे......

यह गुनगुना कर वो फिर.
मजबूर अपनी आवारगी से ...
दुसरे झरोखे पर गयी...रामेश्वरी
बहकाकर वो हमें..
अपने झूठे वादों से..
वो कहने लगे अब...
हम मयखाने होकर आये हैं..
जब देर से ही सही होश में आये हम....
वो दुनिया से कहने लगे...
मोल मिलती है बेहोशी जहाँ..
वहां से हम होश कैसे मोल लाये हैं ......
(.रामेश्वरी )
क्यूँ मयखाने में खाना लफ्ज़ जोड़ते हैं..
जबकि वहां लोग अमूमन पीकर मय दुनिया से मूंह मोड़ते हैं...रामेश्वरी
क्यूँ ग़मज़दा हो मय पीते हो दोस्तों...
कहते हैं कडवी होती है शराब..
गम से कडवी होकर दिखाए तो..
शराब कडवी हम माने...
शराबी गम पीकर दिखाओ तो माने...रामेश्वरी
आज इक डूबते को सहारा दे दूं...
चल फिर किसी पंछी से इक तिनका उधार ले लूं.....
वो उदास है बहुत, डूबा है गम के सागर में...
उस पंछी से उसके लिए मुस्कान और उसकी चहचहाहट ले लूं.....
पंछी निस्वार्थ हैं, उधार पर कभी ब्याज नहीं लेते...
दो खुशियाँ तिनको से देते हैं, वापसी पर जहाज़ नहीं लेते.....रामेश्वरी 
ऐ खामोशियों ना बसर करो, क्या मिलेगा तुझे मेरे घरोंदे में..
लौट कर आयेंगे यहीं वो, लाख हीरे जड़े हो बेगाने घरोदों में......
बेगाने बिस्तर पर चैन की नींद नहीं आती, क्या फायदे ऐसे सोने में...
इससे अपने घरोंदे का उजड़ा कोना अच्छा, समय थोड़ा और है बाट जोहने में.........
.(रामेश्वरी)

श्रृंगार किसने दिया.

नयन काजल भरे..
पग पाजेब घुँघरू धरे...
घुँघरू को स्वर किसने दिया..
कंठ हार मोतियों का..
उज्जवल ज्यूँ अंश ज्योतिका का..
हैरान परेशान सीप में बंद होकर..
श्वेत मोती को आकार किसने दिया...
हस्त धरे हैं कंगन सोने के..
सोने के भीतर कण मोती के..
हृदय उठाए मीठी सी लहर जब २..
तन पर ओडे ओढ़नी लहरिया ..
इस शांत धरती पर, ज्व़ार उत्पन किसने किया..
नारी तू श्रृंगार खुद में...
तुझे ये श्रृंगार किसने दिया..........रामेश्वरी .
गर मिल जाए किनारे से किनारा...
प्रकृति की नयी सौगात यारों...
जुदा कर सके इन किनारों को फिर कोई..
क्या दरिया की औकात यारों....
(रामेश्वरी )
तिजोरी सोने की सजाई अपने दरबार में...
ढेरो खुशियाँ जमा की, बढ़ जाये सोच ..
दो से चार में...
लुटाता रहा गम, पड़ोसियों को प्यार में ...
जब हुई ज़रुरत चाभी खो गयी, जमा की बेकार में..
रह गया तो बस गम, जाऊं कैसे अब मैं..
मदद को पड़ोसियों के द्वार में...........रामेश्वरी
कांपती हांफती हवा इस ओर, अभी अभी आई है...
बचा लो मुझे दुनिया वालों, नफरत मुझे छूने आई है...
मैं शीतल बेरंग अच्छी, ये हथेलियाँ क्यूँ लहू भर लायी हैं ..

Monday, July 2, 2012

याद आ गया बचपन..

याद आ गया वो शरारती बचपन..
जब रंग बिरंगी आईस क्रीम के छींटे ..
कपड़ों पर गिरा करते थे...
क्या२ खाया हमने माँ से छुप छुपकर ..
उसके निशाँ गालों पर मिला करते थे.......
जो दिख गया दुसरे बालक के हाथ..
पाने की जिद उसकी, हम भी माँ से किया करते 
रामेश्वरी

हमें नहीं आता...

ना रूठो तुम..
हमें मनाना नहीं आता...
ना मारो फूल भी तुम...
हमें चोट खाना नहीं आता....
विश्वास अति करो ना हम पर तुम ..
विश्वास हमारे शब्दकोष में नहीं आता...
कहते हो हमसे नैनो की भाषा पढ़ें हम..
हमें जब कलम उठाना ही नहीं आता ...
कहते हो मूरत बना तुम्हारी पूजे हम..
कैसे गढ़ें हम मूरत तेरी...
हमें कुम्हार की चाप घुमाना नहीं आता...
ना पढ़ाओ हमें तुम, प्रेम का पाठ...
सबक याद रखना हमें नहीं आता....रामेश्वरी
मिटा हसरतें वो कहते हैं, जिंदा रहते क्यूँ नहीं....
जिंदा रहते हैं तो भी कहते हैं ताउम्र किसी पर मिटे क्यूँ नहीं
मेरी सोच के बादल आकाश में छाये क्यूँ ...
कहाँ से आया इनमे ये बारिश का पानी...
इतना मैं जाने कब रोई...
धरती पर तब सुकून से सोयी...
काश फिर से उभर कर आये..
इक नयी सोच का ..
मस्तिष्क में सत रंगी इंद्र धनुष ................
मानुष बने फिर से नया मानुष....
.रामेश्वरी
जब जब देखा स्नेह से बादलों की ओर..
बंधी जैसे दोनों में प्रेम की सी डोर....
सहसा कह उठा शरमा कर बावरा बादल भी...
ना ताका कर मुझे यूँ, बहा पसीना,
ना कर बावरी, ये मनमानी ...
बरस पडूँ ना कहीं, तुझ पर, भर स्नेह का पानी ....
चार अच्छाई करोगे, दो तो खुदा से वापिस मिलेंगी..
चाहे दोस्ती में मिलेंगी, या फिर बेवफाई बन के मिलेंगी.
असर हो तो कैसे ..
वो किसी और की यादों में डूबा..
दुनिया से बेखबर होता है..
याद करना सजा मेरी होती है...
भूल जाना उसकी अदा में होता है.......रामेश्वरी
मानने से क्या होता है, मनाना क्या होता है...
जब हम रूठे ही नहीं, ये सब आजमाना क्या होता है....रामेश्वरी
रोको ना इन कदमो को मेरे...
इनके तले ज़माना है...
मिट गयी तो समझो मिटटी थी...
नहीं तो सब कुछ इसी से हमें पाना है....रामेश्वरी
बादलों में उड़ान भरी थी मैंने भी कभी...
वो रिमझिम बरसते रहे सरे राह ...
और हमारी धरा से नजदीकियां बढती रही...........रामेश्वरी
वो अपनी रुखसती पर कह गए थे..
अब ना आयेंगे ख्वाबों में कभी...
ये नैन हैं की अब पलक भी झपकते नहीं..........
(रामेश्वरी )
जा जाने वाले रुखसती से पहले..
आईना तो देखता जा इक बार...
जब जब देखे तू निगाहों में गैर के कभी..
तेरी असली सूरत नज़र आये कभी.....रामेश्वरी
दोगे क्या तुम हमें..
मय के दो घूंट ऐ साकी...
हम तो गम के घूंट ..
जिगर में उतारते हैं..
दे सके तो दे हमें ...
तेरे भी गम जितने बाकी हैं....रामेश्वरी
रोने दो मुझे आज जी भर के...
ह्रदय की ज़मीन बरसों से सूखी है...
ऐ बादल तू क्या देगा नैनो को पानी मेरे...
तू खुद इस धरती के लोगो से दुखी है....
.रामेश्वरी

अग्नि परीक्षा दूँगी नहीं

अब अग्नि परीक्षा दूँगी नहीं मैं ...
कठोर किया है ह्रदय मैंने...
वादा किया है स्वयं से मैंने..
खुद को अग्निअवरोधक करूंगी मैं .......
जलूँगी नहीं किसी के जलाने से...
गर जा रहे हो प्राण ऐसे मेरे...
संग अकेले नहीं जाऊंगी मैं...
संग सात फेरे लिए हैं..
वादा निभाऊंगी मैं...
संग अपने सातों वचन निभाने ..
उन्हें ले जाऊंगी मैं.............
अब अग्नि में नहीं समाऊँगी मैं.....
(रामेश्वरी )..
लोग अक्सर कहते हैं ..
ज़माना ख़राब है..
हम कहते हैं जनाब..
हमें आज़माना ख़राब है.....

किले खंडहरों में..

जब जब कभी किले खंडहरों में..
अतीत से सामना हुआ है...
प्रश्न जगा हर बार ज़ेहन में..
ये अतीत भी कभी वर्तमान रहा होगा..
किसी राजा महाराजा का अरमान रहा होगा..
रही होगी चहल पहल यहाँ..
हँसना गाना हुआ होगा...
आज जहाँ वीराना है...
कभी मुस्कुराता चमन रहा होगा...
जहाँ पग धरे हैं मैंने आज...
वहां रंगीन दरियां बिछीं होंगी...
राजा प्रजा के बीच रेखा खिंची होगी..
रही होगी घोड़ों की टाप भी कभी...
इतिहास जीवंत होने लगता है ..
दृष्टि पटल पर जैसे अभी....
क्या उन्हें मालूम था..
कल तक जो वर्तमान थे...
आज नव पीढ़ी का इतिहास होंगे...
उन्हें जानने के कैसे२ प्रयास होंगे...
(रामेश्वरी )
ऐ नदिया मुझे संग लेकर बह चल...
अपने किनारों से टक्करा कर...
जिंदा होने का एहसास चाहती हूँ मैं....रामेश्वरी
हम खुश फहमी पाले बैठे थे की हमने एक मुकाम पाया है...
पर मुकाम किसी संघर्ष की शुरुआत नहीं, एक अंत पाया है.........

अपना

हर अजनबी में क्यूँ हम अपना खोजते हैं...
ये कैसी सोच है और हम क्यूँ सोचते हैं?
दौर आगे बढ गया, अपनापन पीछे छुट गया..
लहू का नमक, पानी में क्यूँ घुल गया?
क्या मिलावट का दौर लहू में मिल गया...
भीड़ में अकेले से, अकेले में अपनों की भीड़ खोजते हैं...
क्या यही विकास है? क्या आज सभी यही सोच सोचते हैं?...........रामेश्वरी
हम जल रहे हैं ईर्ष्या में इतने...
कि उस बेवफा ने हाथ ठण्ड में सेकें हैं....
टूटे टुकड़े दिल के हिस्सों में इतने..
हम जोड़ते रहे, उसने हर दिशा में फेंके हैं..
जो नब्ज देख भी रोग ना समझे, वो हकीम क्या...
जो जख्मो से कीमत मांगे अपनी, वो दवा क्या..
जो नफरत भरे इंसानी सीनों में, वो आबो हवा क्या...
जिसे इंसानियत सिखाये इक नन्हा जानवर, वो इंसान क्या...
जिससे खुद के हाथ रहे सलामत, उस कलम की धार क्या...
क्षितिज पर आकाश ख़तम हो गर, उस आकाश का फिर पार क्या...
धन चढाने से गर ईश्वर मिले, क्या भक्ति का भी हो रहा नहीं व्यापार क्या...
हर दिन लैला बदले, खोज रहे मजनूं , ये हवस नहीं तो और है क्या...
दोस्त मिलेंगे बहुत, गर दुश्मनों में इक दोस्त मिल जाये, करिश्मा नहीं क्या....

तेरे पर.. उधार चाहती हूँ...

सुन ऐ परिंदे ..
कुछ पल को तेरे पर..
उधार चाहती हूँ...
अब सब्र नहीं बंधन में मेरे..
इस बंधन से पार चाहती हूँ..
उड़ चुका तू बहुत ..
अब ऐ परिंदे ..
तनिक विश्राम कर...
अपने भोर की तू शाम कर..
उड़ान दे दे उधार ..
कुछ पलों को मेरे..
ना मेरी कोशिशों को नाकाम कर...
ना कहना फिर नारी तू...
क्यूँ बंधन में रहती है........?
(रामेश्वरी)
कोई तो दोस्त था, जो हमसे मनाया ना गया...
वरना दुश्मन इतने, पूरजोर कहाँ थे...रामेश्वरी

सच ना बोल.

किसने कहा था सच ना बोल...
बेईमानो के बजा ना ढोल...
बंद है किवाड़ अंतरात्मा के..
उनको ना तू खोल...
डकार एक आई ना...
भरा जब पेट, नोटों से मूंह ''खोल खोल...
बोल बोल,,
अब थक गया ना नित नए..
झूठ बोल बोल..
लगे थे बड़े तुझे भी सुहावने...
झूठ के ढोल...
बोल बोल अब झूठ ही बोल...
पाप पुन्य का क्यूँ अब कर रहा ..
हे तू तोल मोल ...
बोल बोल..
था कभी शेर तू ..
गीदड़ की अब खाल ओढ़ ...
अब चाहता है दहाड़ क्यूँ..
बस अब गीदड़ की बोली बोल..
बोल बोल...(रामेश्वरी)
थोड़ा थोड़ा पियोगे इस मय को, दवा ए अदब बनेगी...
हद से गुजर जो गयी संभलो, बदनामी का सबब बनेगी....
(रामेश्वरी )