जब भी लहर इक हवा की बह कर ..
मेरे करीब से गयी....
शायद यही मेरे कानो में फुसफुसा कर ...
वो यूँ गयी...
शीतलता चपलता दूँगी अपनी मगर...
अपनी आवारगी से दूर रखूंगी तुझे......
यह गुनगुना कर वो फिर.
मजबूर अपनी आवारगी से ...
दुसरे झरोखे पर गयी...रामेश्वरी
मेरे करीब से गयी....
शायद यही मेरे कानो में फुसफुसा कर ...
वो यूँ गयी...
शीतलता चपलता दूँगी अपनी मगर...
अपनी आवारगी से दूर रखूंगी तुझे......
यह गुनगुना कर वो फिर.
मजबूर अपनी आवारगी से ...
दुसरे झरोखे पर गयी...रामेश्वरी
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