अंकुर फूटने लगे हैं शाखाओं पर..
फिर से होगी बहार इस गुलशन में
बस हरित पात बनने की देरी है..
फिर भी गमसुम सा क्यूँ ये गुलशन है ...
ये शांति साँझ की है, या ये सबेरे की है...
समझ आता नहीं, ये शांति किसने बखेरी है..
ये गुनाह फिजा का था, या ये दरियादिली सावन ने बिखेरी है...
.....रामेश्वरी
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