जो नब्ज देख भी रोग ना समझे, वो हकीम क्या...
जो जख्मो से कीमत मांगे अपनी, वो दवा क्या..
जो नफरत भरे इंसानी सीनों में, वो आबो हवा क्या...
जिसे इंसानियत सिखाये इक नन्हा जानवर, वो इंसान क्या...
जिससे खुद के हाथ रहे सलामत, उस कलम की धार क्या...
क्षितिज पर आकाश ख़तम हो गर, उस आकाश का फिर पार क्या...
धन चढाने से गर ईश्वर मिले, क्या भक्ति का भी हो रहा नहीं व्यापार क्या...
हर दिन लैला बदले, खोज रहे मजनूं , ये हवस नहीं तो और है क्या...
दोस्त मिलेंगे बहुत, गर दुश्मनों में इक दोस्त मिल जाये, करिश्मा नहीं क्या....
जो जख्मो से कीमत मांगे अपनी, वो दवा क्या..
जो नफरत भरे इंसानी सीनों में, वो आबो हवा क्या...
जिसे इंसानियत सिखाये इक नन्हा जानवर, वो इंसान क्या...
जिससे खुद के हाथ रहे सलामत, उस कलम की धार क्या...
क्षितिज पर आकाश ख़तम हो गर, उस आकाश का फिर पार क्या...
धन चढाने से गर ईश्वर मिले, क्या भक्ति का भी हो रहा नहीं व्यापार क्या...
हर दिन लैला बदले, खोज रहे मजनूं , ये हवस नहीं तो और है क्या...
दोस्त मिलेंगे बहुत, गर दुश्मनों में इक दोस्त मिल जाये, करिश्मा नहीं क्या....
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