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Thursday, July 5, 2012

ना धनवान की सुन ..
ना कर्ज़दान की सुन...
ना ऊँचे रसूख वालों की सुन .
ना ऊँचे मकान वालों की सुन ...
ना तंत्री, ना संत्री की सुन, ना मन्त्री की सुन ...
बस मानसून ..
तू इक किसान की पेट की सुन...
तड़पते प्यासे पंछियौं की सुन...
गरीबों के खनकते कनस्तर की सुन...
रहने सेठों के बनाते महलों के, धूप में झुलसते..
मजदूर के बदन की सुन...
तड़पती बिन पानी, मछली की सुन...
आहें भरती हर हर गंगे माँ की सुन...
क्यूंकि बिन पानी सब सुन...................रामेश्वर

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