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Sunday, May 13, 2012

माँ

चोटें गर लगी हमें ..
रोता माँ को पाया हमने...

सोये जब जब सूखे में हम...
माँ को गिले में सुलाया हमने...
रातों को सुकून से निर्भीक सोये हम...
अपने हाथों को माँ ने झुला बनाया..
यूँ नींद को पाया हमने...

तप कर कड़ी धूप में थके जब २
माँ के विशाल सीने से लग ..
सुकून शीतल पाया हमने....
संघर्ष के गर्म थपेड़ों पर...
बरगद सा माँ को पाया हमने...


जाए कोई काशी, काबा ...
जाऊं क्यूँ मंदिर कोई?
घर में भगवान बसाया हमने ...
माँ के चरणों में ही ..
हर तीर्थ पाया हमने..


जोड़े कोई धन दौलत ..
हमने माँ के हर श्वेत अश्रू जोड़े हैं...
खपी, तोड़ हाड मॉस अपना..
उदर भरा हमारा...
आज वक़्त सेवा का आया..
हम शहर को दौडे हैं...
स्वार्थ भीतर बसाया हमने ....

कड़ी तपस्या की माँ ने...
और फल मीठा उसका पाया हमने ...रामेश्वरी 





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