वो देखो बादलों को चीर कर एक किरण अस्तित्व में आई है |
कब तक ढक सकता था, मनचला है वो, जान आफत में आई है ||..................रामेश्वरी
आज सच दबा है, कल कंठ में हुंकार होगी |
त्राहित्राहि करेगा झूठ, दो घूंट जल की पुकार होगी ||.
जब अपनों से ही घायल हुए, तो अब गैरों से क्या डरना |जब मर ही गए अपनों के हाथों, मरे हुए को और क्या मरना ||....
कब तक ढक सकता था, मनचला है वो, जान आफत में आई है ||..................रामेश्वरी
आज सच दबा है, कल कंठ में हुंकार होगी |
त्राहित्राहि करेगा झूठ, दो घूंट जल की पुकार होगी ||.
जब अपनों से ही घायल हुए, तो अब गैरों से क्या डरना |जब मर ही गए अपनों के हाथों, मरे हुए को और क्या मरना ||....
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