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Thursday, April 12, 2012

वो बचपन का चाँद

दिन भर की मेहनत से..
थका थका सा टूटा सा ये तन मन ..
थोड़ा सुस्ता लूं ...
सुन शीतल पवन थोड़ा सुला दे मुझे ...
छु कर जा मुझे भी, जैसे छुआ गुलाब...
चिंतित ह्रदय में अब भी उठ रहे सैलाब ...
कैसे दूँगी, कल भविष्य को जवाब...
चाँद भी अब, कहानियाँ सुनाता नहीं..
टिमटिमाता तारा दूर तक नज़र आता नहीं....
बस छाए गर्दिशों के बादल हैं...
मैला सा अब, आकाश का आँचल है....
छोटे थे जब, इन्ही तारों में गम छुपा देते थे...
चाँद का मासूम चेहरा देख, मुस्कुरा दिया करते थे ...
जब से आकाश भी बोझिल नाराज़ है...
बचपन भी बुझा बुझा सा, नाराज़ है....रामेश्वरी

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