देती थी रूह को जो सुकून ए छाँव |
बरगद की डालियाँ वो अब कट चुकीं ||
सीमा पर उगा था बदकिस्मत वो भी |
देश बंटे, वो डालियाँ भी बंट चुकीं ||
जो यहाँ शांति थी वहां सुकून था||
यहाँ सनक थी, वहां जूनून था||
दोनों की तपन पर एक थी....
दोनों के सर तप रही धुप एक थी |
दोनों को चाहिए सर छाँव एक थी|
क्यूँ बरगद फिर धराशायी हुआ ||
(रामेश्वरी )
बरगद की डालियाँ वो अब कट चुकीं ||
सीमा पर उगा था बदकिस्मत वो भी |
देश बंटे, वो डालियाँ भी बंट चुकीं ||
जो यहाँ शांति थी वहां सुकून था||
यहाँ सनक थी, वहां जूनून था||
दोनों की तपन पर एक थी....
दोनों के सर तप रही धुप एक थी |
दोनों को चाहिए सर छाँव एक थी|
क्यूँ बरगद फिर धराशायी हुआ ||
(रामेश्वरी )
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