आज भी मकबरे में कब्र में मेरी, उमस बहुत है |
क्या कोई मेरा अपना, मेरे लिए रोया भी नहीं ||...
क्या कोई मेरा अपना, मेरे लिए रोया भी नहीं ||...
यूँ तो अकेला नहीं, बगल में कब्र गैरों की बहुत हैं |
ताल्लुक रखा रसूख वालों से, अकेला सोया कभी नहीं ||
हर बरस मेला सजता है कब्र पर मेरी, भीड़ बहुत है |
लोग आते कांटे छोड़ जाते हैं, क्यूँ सुकून फूलों सा बोया नहीं ||
रूह देती आवाज़ बार२, सुनो जग वालों, ये कांटे चुभते बहुत हैं |
कहा हर आते जाते ने, जैसा बोते वैसा पाते हैं, क्या तुमने कांटा बोया नहीं ?
इसीलिए हर मेले कब्र पर तुम्हारी, हम कांटे छोड़ जाते हैं कांटे छोड़ जाते हैं >>>>>>>>>>>>>रामेश्वरी
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