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Saturday, June 2, 2012

वृधावस्था

जब जब ..
किसी हरे भरे वृक्ष की..
पीली पत्तियों को झडते देखा है..
देखा है उन्हें..
रौंदते युवा पांवों को ..
चीख भी ना सके वो..
था ही नहीं साहस उनमे..
सहम गयी ...
क्या ऐसा ही होता है...
जब जब वृधावस्था जकड़ती है...
क्षण क्षण क्या ?
हमें भी झड़ना होगा..
क्षीण होगी क्या शक्ति हमारी भी?
क्या हमें भी रौंदेंगे युवा पाँव ...
सह पायेंगे इस पीड़ा को?....
मौन होती इस जिह्वा को...
क्या चीत्कार कोई सुनेगा हमारी? 
या दब जायेंगे ह्रदय भाव हमारे...
या फिर गिरना होगा ....
जैसे सूखे डाल वृक्ष के..........रामेश्वरी 

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