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Friday, March 6, 2015







ना जाने क्यों लोगों को साफ़ सुथरे और उज्जवल वस्त्र धारण किये मानुष ही सुन्दर लगते हैं और भाते हैं ?      वह माँ कितनी खूबसूरत है जिसके चेहरे  पर  किसी सेठ की नवनिर्मित भव्य इमारत की मिटटी लिपी हो ।  जिसके वस्त्र मैले हैं दिनभर अपने मासूम बच्चों का पेट भरते२,  झूठे बर्तन धोते२ ।  उनके मैले कुचले और पसीने से लबालब वस्त्र क्यों उन्हें सुगंध नहीं दे पाते ? क्या यह माँ सुन्दर नहीं उस माँ से, जो  अपने पसीने को सिर्फ जिम जाकर इसीलिए बहाती है ताकि उसका बाहरी सौंदर्य बना रहे ।  क्यों लोग बाहरी सौंदर्य को तवज़ु देते हैं,  और खूबसूरत मन, सांवले तन मन को ताउम्र घुटघुट कर जीने को मजबूर करते हैं ?   यदि मासूम बच्चे से पुछा जाए तो वह सबसे खूबसूरत अपनी माँ को ही कहेगा ।  शायद सच्ची खूबसूरती की परख मासूम बच्चे ही रखते हैं ।  ये विश्वव्यापी सौन्दर्य  प्रतियोगिताएँ झूठ मात्र ।   रामेश्वरी 

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