नेता बनने का, ज्वार अभी,
थमा नहीं ।
आम आदमी बनने का,
चढ़ा ऐसा बुखार ।
बने त्रिशंकु,
लटके बस में,
चले कोसों दूर ।
त्याग क़ीमती कार ।
हाल ऐसा, बस...
कहा नहीं ।
रक्त बस, जमा नहीं ।
हाँ की, हुज़ूरी की ।
बेईमानो से दूरी की ।
प्राणी बन गए, हम तो न्यारे ।
टोपी पहना गए, अपने सारे ॥
No comments:
Post a Comment