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Monday, October 29, 2012

हरीतिमा, किरणे, खुशगवार

ताक सकी जहाँ तक,..
दो नयनों की सीमा ..
धरा ओढ़े चादर हरीतिमा ..
मृत्तिका भी लिपटी अब।।
धरा से यूँ मुंह खोले।।।
दिनकर अब गर्म किरणे छोड़े ..
देख मौसम खुशगवार ...
बावरे बादल इत उत डोले ....

सुन सको तो सुनो रख धीर ..
बहता नीर कोउन धुन बोले।।। रामेश्वरी
GOOD MORNING FRIENDS

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