अपनी अपनी महाभारत सबकी ..
अपनी अपनी लडाई ।।
अपना अपना कुरुक्षेत्र सभी का ।
अपनी अपनी चडाई ।।
अपना अपना लक्ष्य ..
अपना अपना भेद सभी का ।
अपने अपने रावण सब..
अपना अपना राम सभी का।
अपने अपने मंदिर सबके ..
अपनी अपनी खुदाई..
अपने अपने रब सबके ।..
अपने अपने रब सबके ।..
कलयुगी हनुमान ने
लंका की की बडाई।।
गर्म की जेब अपनी।।
अयोध्या में आग लगायी।।।
अपनी अपनी तिजोरी सबकी।।
अपने अपने खीसे ..
कोई किसी को रोटी पूछता नहीं।।
अपना अपना अन्न सभी का।।
अपनी अपनी पिसाई।।।
दौड़ रहे सब अंधी दौड़ में ..
कौन किसी का पिसे ।।
अपने अपने पत्थर, हाथ सभी के।।
अपने अपने शीशे ।।
अपना अपना श्रम सभी का।।
अपना अपना करम।।
आज के श्रवन को।।
गरीब बाप पर शरम ।।।
अमिताभ को उसने देखो।।
पिता से ऊँची पदवी दिलाई।।।
अपने अपने आँगन सबके ।
अपनी अपनी लुगाई ।।
बंटवारे में बंट रहे।।
माता पिता ने मौत की गुहार लगाई।।। रामेश्वरी 9/11/12

No comments:
Post a Comment