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Sunday, November 18, 2012

वो पगली ।।

बेसुध थी वो ..
अबोध बच्ची सी ..
वो पगली ।।

ढांप सके लाज अपनी ..
ये सुध कहाँ .
सीने से कतरा ..
लहराती फिर रही .
मासूम तितली सी ..
वो पगली।।

दुप्पटा कहाँ,  वो अब कतरन हो गया ।
वहशी हावी उस पर जबरन हो गया।
योवन बालपन की ओर ..
एक कदम और उतर गया ।
फिर भी निश्छल।।
हंस रही ..
वो पगली।।

घर नहीं द्वार नहीं।
दुनिया से खुदी से ..
उसे सरोकार नहीं।
रिश्ते नहीं, 
धर्म जातें नहीं।
मिटटी का टीला ..
लोट पॉट जिस पर वो।
वही उसका ..19/11/12
घरौंदा हो गया ।
ठण्ड से सिकुड़ रही।।
वो पगली।।


ले वो किसकी आड़ ।.
ललचाई जीभ ..
खड़ा वहसी,  नज़रें  गाड़ ..
ह्रदय देख ये सब।।
होशमंद होने पर।
"रामी" शर्मिंदा हो गया ।
हमसे तो भली ।
वो पगली।।।।।रामेश्वरी 19/11/12






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