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Sunday, September 16, 2012

मेरी एक दोस्त के पिता का देहांत हुआ, मैं भी श्रद्धा सुमन अर्पित करने वहां गयी थी | मेरी दोस्त बहुत दुखी थी, वो चुपचाप एक कोने में बैठी रो रही थी |   उसके परिवारजन और सगे सम्बन्धी भी वहीँ शोकाकुल अवस्था में थे |   मैंने अपने दोस्त की आँखों में न भरने वाला जख्म देखा और महसूस किया जो उसके पिता की मृत्यु से उसे मिला | वो अपने पिता से बहुत स्नेह रखती थी उसके लिए वही उसकी माता भी थी |  पर तभी उसकी बड़ी बहिन आई और जोर जोर से चिल्ला कर रोने लगी, सारा घर उसने सर पर उठा लिया |  वो ये शोर तब तक मचाती रही जब तक अर्थी को अंतिम संस्कार के लिए नहीं उठाया गया|  लोग कहने लगे देखो कितना प्यार स्नेह रखती है अपने पिता से|   क्या शोर मचाना चिल्ला२ कर रोना ही सच्चा स्नेह का प्रतीक था, मेरी दोस्त जो आज तक वो हादसा भुला नहीं पायी, उसका स्नेह कम था| उस दिन यकीन हुआ वाकई ज़माना दिखावे का है जब कुछ ही पल बाद वो हंस रही थी  और शमशान घाट  से सम्बन्धियों का इंतेज़ार किये अपने घर लौट गयी |  ......रामेश्वरी 

3 comments:

  1. ye sansaar dikhave par hi chal raha hai......
    aur is dikhave ka kabhi ant nahi hoga,
    haa wo dard sab ke kaleje me shool ki tarah
    chubhta hoga jo kisi ke alag ho jane par hota hai.......... :(

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  2. par prem main bhi dikhawa..kahan tak sahi hai....

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  3. PAR PREM MAIN BHI DIKHAWA KAHAN TAK SAHI....

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