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Tuesday, September 11, 2012

कड़ी धूप, हाथ टिकाये माथे.
तेरी बाट जोहती हूँ मैं...
नहीं आएगा तू, यह भी जानती हूँ मैं ..
फिर क्यूँ उम्मीद का  बीज ..
अपने बाँझ ह्रदय में बोती हूँ मैं....
शायद तू आये, फूटे कोपलें ह्रदय मेरे...
सोच सारी रात, सींचने बंजर ह्रदय ...
आँगन के किसी कोने में रोती हूँ मैं ....
आज भी महसूस करती हूँ ...
खुशबू तेरी इन हथेलियों में ..
आओ तुम या भूल जाऊं तुम्हें ..
कई बार जगकर नींद से..
अपनी हथेलियाँ धोती हूँ मैं..
शुभ संध्या ...सभी को...


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