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Tuesday, August 23, 2011


आज फिर घटा जोरो से बरसी है..
फिर बदली घुमड़ घुमड़ कर लहराई है
इन्दर्धनुष ने दौड़ लगाई...
बह पुरवाई आई है...
बूंदे छम छम थिनक२ नाची हैं...
बूंदों का नृत्य देख रवि लजाया है 
सावन आया है, सावन आया है..
मनवा इतना हर्षाया है....
पपीहा बन बरसात में ...
ईत उत डोल आया है...
नदी अपने में जल रुपी प्रेम भर..
सागर से मिलन को बेसुध दौड़ी है...
मन करे इसे पकड़ लूं...
इस सावन की उम्र थोड़ी है ....
(रामेश्वरी )

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