रावण क्यूँ परेशान ?
हैरान है रावण .
दुनिया की कार्यवाही से। .
खुद कलयुगी रावण। .
फूँक रहे. .
मुझे!
कितनी वाह वाही से। .
तुलना करूँ, कभी जो..
कृत्यों की..
न्याय चाहूँ मैं ?
दुशासन स्वछंद फिरे . . .
क्यूँ युगों अग्नि समाऊँ मैं ?
अब शायद प्रकृति भी। .
गवाह रहेगी मेरी
अब ना अग्नि समाऊँ मैं ?
सम्मान दिया राम ने। .
तुमसे मुखाग्नि ना चाहूँ मैं ?
स्तब्ध हूँ। .
न्यायिक कार्यवाई से ॥ रामेश्वरी।
(संस्मरण )
बचपन मैं जो उत्साह रामलीला देखने को हमारी दिलों में होता था वो शायद अब की पीढ़ी के बच्चों में नहीं दिखाई देता । मुझे आज भी अपने मोहल्ले की रामलीला के सभी लोग अच्छे से याद हैं जो भिन्न भिन्न पात्र निभाया करते थे । एक दो बार मैंने खुद भी रामलीला की शुभारंभ आरतीयों में हिस्सा लिया था । हमारे मोहल्ले में रावण का पात्र निभाने वाले युवक जो की मेरे बड़े भाई के मित्र भी थे, मोहल्ले में बहुत लोकप्रिय थे । जब भी वह गली मोहल्ले से गुजरते, हम सभी बच्चे यकायक ख़ुशी से कह उठते" देखो रावन जा रहा है " । उस दौर में वह हमारे लिए जैसे एक बड़ी फ़िल्मी हस्ती जैसे थे । वह बहुत ही सभ्य इंसान थे ।
बात उन दिनों की है जब कंप्यूटर युग शुरू ही हुआ था और सभी टाइपिंग सीखा करते थे । हमारी क्लास में एक युवक था, जो की बहुत ही हसमुख और शरारती था । लड़कियों से फ़्लर्ट करना जैसे उसकी आदत थी । मैं सांवली रंगत की थी सो मेरे से उसका व्यवहार सिर्फ दोस्त वाला था । एक दिन अचानक सुबह सुबह दरवाजे की घंटी बजी और संयोगवश दरवाजा खोलना भी मुझे ही पड़ा । सामने जिस शख्स को देखा तो हैरान । वहां कोई और नहीं वही युवक था जो मेरे साथ टाइपिंग सीखा करता था । मुझे देखते ही वो बिल्डिंग से नीचे उतर गया । संयोग वह मेरे बडे भाई साहब से रामलीला के बारे में जानकारी हेतु आया था । मैंने अपने भाई साहब से पुछा तो उनसे मालूम हुआ की यह वही युवक था जो राम का पात्र निभाता आया है । मैं उस युवक को राम के पात्र में कभी पहचान नहीं पायी, क्यूंकि उस समय वह भारी भरकम मेक-उप में हुआ करता था । आज भी मैं इस बात पर हँस देती हूँ कि यह भी अजब संयोग रहा की राम जैसा सभ्य इंसान रावण पात्र निभाता आया था । और कुछ कुछ रावण जैसा युवक राम का पात्र निभाता आया था । वो भी सिर्फ चेहरे मोहरे के कारण । क्या चेहरा इतना मायेने रखता है ? रामेश्वरी

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - रविवार - 13/10/2013 को किसानी को बलिदान करने की एक शासकीय साजिश.... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः34 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra
ReplyDeleteबहुत सुन्दर .
ReplyDeleteनई पोस्ट : रावण जलता नहीं
नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
विजयादशमी की शुभकामनाएँ .