लहराती,
इठलाती,
धरा सहलाती,
मधुर गान गुनगुनाती,
मैं सुघोषा,
फिर !
दे रहा कौन,
आज ये मौन ?
ढोती पापी,
धोये पाप ।
आज यही संताप
सदियों रही वही मैं ।
स्वयंभू भागीरथ बना,
बैठा है कौन ? रामेश्वरी
(गंगा माँ का इतना रौद्र रूप देखने के बाद भी क्या उत्तराखंड की सरकार ने कुछ भी सबक नहीं लिया । इतनी भारी मात्रा मैं जान माल की हानि हुई, फिर भी इन सब के बावजूद हर की पौड़ी तक जल स्तर बहुत कम कर दिया गया है ॥ अगले वर्ष कहीं माँ का रौद्र रूप इससे भयावह ना हो ? प्रकृति से छेड़छाड़ बुरी है क्यूँ अहंकार पाल रहा है इंसान ।)रामेश्वरी

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