जब२ खुदा से हमारी मुलाकात होगी...
न जाने कितनी शिकायतें होगी.....
जाने कितनी ही फरियादें होंगी.......
जाने उनके आगे कितने अनगिनत ..
सवालिया निशाँ होंगे?
सोच सोच खुदा भी यूँ ही परेशान होंगे...
पंछी सा ह्रदय दिया तो पंख दिए क्यूँ नहीं?
निश्चल बहती गंगा सा स्वाभाव दिया...
तो इतने रिवाजो रीतियों के बाँध बनाये क्यूँ?
शीतल हवा सी चंचलता दी ........
तो इस हवा पर इतने पहरे और जंजीरे जकड़ी क्यूँ?
बना हमें खुद, तुम खुद से तो खुदा हो गए...
हम पत्थरदिल दुनिया से टकरा२ पत्थर हो गए...
अब इस पत्थर को प्रेम दरिया में बहाते हो क्यूँ?
गर रखना था गहन अँधेरे में, इतनी चपलता दी ही क्यूँ?...रामेश्वरी
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