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Saturday, January 7, 2012

चाहत ...
होती क्या है परिभाषा इसकी...
क्या है निराकार, या है क्या आकार इसका...
क्यूँ यह अलग२रूप लेती ?

भूखे की चाहत रोटी....
नग्न देह की चाहत धोती...
नेता की चाहत वोट.
कांपते बदन को कोट ..की
बहते दरिया को सागर की..
उफनते पानी को बांध की ...
योगी को योग की..
रोगी को निरोग की..
प्रेमी को प्रेम..
कफ़न बांधे युवा को..
देशप्रेम की..
बच्चों को नेह की..
कोडी को देह की......
प्यासे को सागर की...
बेशर्म को गागर की...

माया अनंत ..चाहत अनंत है..
धन्यवाद् मेरी चाहत का भी यहीं अंत है....रामेश्वरी

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