जिस कुरूप माँ ने चलना सिखाया उसके रूपवान बच्चों के
लडखडाते क़दमों को....
आज वही रूपवान बच्चे सम्भाल नहीं पाते लडखडाते कदम ..
अपनी कुरूप माँ के....
जिनके कदम सही पड़े सोचकर चली वो मीलों पैदल..
आज दो कदम साथ उसके शर्म से चल नहीं पाते ..
हर धूप में छाँव दी उसने अपनी ममता की...
आज भरी दोपहरी छोड़ आये उस दामन को...
बीच चौराहे पर................
लडखडाते क़दमों को....
आज वही रूपवान बच्चे सम्भाल नहीं पाते लडखडाते कदम ..
अपनी कुरूप माँ के....
जिनके कदम सही पड़े सोचकर चली वो मीलों पैदल..
आज दो कदम साथ उसके शर्म से चल नहीं पाते ..
हर धूप में छाँव दी उसने अपनी ममता की...
आज भरी दोपहरी छोड़ आये उस दामन को...
बीच चौराहे पर................
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