सर्द दिन, सन्नाटा गहन पसरा है ।
चल पथिक, पथ कितना संकरा है ।
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है ।
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है ।
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है ।
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...रामेश्वरी
चल पथिक, पथ कितना संकरा है ।
गहन है धुंध, तू पथिक वखरा है ।
ज़र्र पत्तियाँ , तूने पग धीमे धरा है ।
जाने किसका दामन, राह में बिखरा है ।
भय क्यूँ, ये ऋतु का चौमासी नखरा है ।
बढेगा, पायेगा तभी, जहाँ हलाहल बिखरा है ...रामेश्वरी
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