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Saturday, May 11, 2013

इन सर्द धुंधली राहो में ..
देखो कैसे ये वृक्ष तने से हैं ..
झड चुके हैं पात, शाखों से इनकी ..
उग रहे ख्वाब, कोमल टहनियों में ...
आएगा सावन फिर से .
पड़ेंगी बूँदें, प्यासी धरा पर ..
उड़ेगी मृत्तिका श्वास फिर से ..
लिए मंद मंद खुशबू मटैली ..
फिर नाचेगी, प्रकृति फैला छटा नखरेली ..

मिट रहे शाख, राहों से फिर बंट जायेंगे ..
सब्र करना सीखो मानुष, मुफलिसी के दिन भी ..
बदलते मौसम से कट जायेंगे ..
धुंध से आगे भी जीवन है ..
ना इसको ठहराव कहो ..
समय की अविरल धारा .
सदैव संग बहो ......रामेश्वरी

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