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Saturday, May 11, 2013






मैंने जनम लिया ।  
वो स्त्री से माँ हो गयी ॥ 

मैंने पग धरे, धरा पर । 
वो मेरी नींव का, सामान हो गयी । 

प्रथम शब्द, माँ से लिया । 
वो माँ से, गुरु हो गयी 
यूँ प्रथम शिक्षा शुरू हो गयी । 

मैं यौवन की प्रथम सीढ़ी पर ...
माँ आखिरी सीढ़ी,  खड़ी हो गयी । 

आज भी वो देख बैचेनी मेरी ..
सोती नहीं । 
मैं बूढ़ा अब हो चूका हूँ । 
माँ फ़र्ज़ से बूढ़ी होती नहीं । 

दवा देने से पहले आज भी । 
माँ ......मुख में दाना धरती नहीं । 
माँ ....कभी मरती नहीं । 

अब माँ नहीं है दुनिया में । 
छवि उनकी अब देखूं मुनिया में । 
बिटिया भी मन से माँ जैसी होती है । 
अब वो दवा देकर सोती है ..रामेश्वरी 


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