मैंने जनम लिया ।
वो स्त्री से माँ हो गयी ॥
मैंने पग धरे, धरा पर ।
वो मेरी नींव का, सामान हो गयी ।
प्रथम शब्द, माँ से लिया ।
वो माँ से, गुरु हो गयी
यूँ प्रथम शिक्षा शुरू हो गयी ।
मैं यौवन की प्रथम सीढ़ी पर ...
माँ आखिरी सीढ़ी, खड़ी हो गयी ।
आज भी वो देख बैचेनी मेरी ..
सोती नहीं ।
मैं बूढ़ा अब हो चूका हूँ ।
माँ फ़र्ज़ से बूढ़ी होती नहीं ।
दवा देने से पहले आज भी ।
माँ ......मुख में दाना धरती नहीं ।
माँ ....कभी मरती नहीं ।
अब माँ नहीं है दुनिया में ।
छवि उनकी अब देखूं मुनिया में ।
बिटिया भी मन से माँ जैसी होती है ।
अब वो दवा देकर सोती है ..रामेश्वरी
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