हिंदी फ़िल्में,
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया, जी हाँ, ये एक हिंदी फिल्म का गाना है , जो मुझ नाचीज़ पर फिट बैठता है। हिंदी फिल्मो में सब कुछ है या यूँ कहूं तो जीवन जीने की कला हिंदी फ़िल्में बेहतर सिखाती है। मेरे एक दोस्त को तो इतना फोबिया हुआ की वो निरूपा राय को ही अपनी माँ मानता था और असली माँ को ललिता पंवार। एक दोस्त तो खाते पीते , सोते उठते बस कुछ रटे -२ डायलॉग ही बोलता रहता था मसलन " हम जहाँ खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीँ से शुरू होती है , हांय !" या " जली को आग कहते हैं बुझी को राख कहते हैं ...जिस आग से बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं।" ये फ़िल्मी डायलाग भी पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहते हैं, एक बुजुर्ग से पूछ लिया कोई हिंदी फिल्म का डायलाग सुनाओ तो मुगले आजम सुनाने को झटपट तैयार हो गये लो जी " हमारा हिन्दुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं एक लोंडी जिसकी मलिका बने ..तो सलीम कहता है "मेरा दिल भी कोई कोई आपका हिन्दुस्तान नहीं जिस पर आप हुकूमत करें।" अब मुझे समझ आया बीज तो इन बुड्ढों के जमाने में ही बोये गए थे। अगर आज सलमान खान गाता है की " इश्क के नाम पर करते सब रास लीला है , मै करूं तो साला करैक्टर ढीला है" तो हरगिज़ नाइंसाफी नहीं। तो मेरे कोरे जीवन की बातें हो रहीं थी , कोरा यूँ की हिंदी फिल्मे ज्यादा नहीं देख पाया , गुरु जी पूछते कितने दंड पेले , कितनी बैठक लगाईं, कितने रस्से चढ़ लिए , तो जवाब मिलता ३ हज़ार दंड, २ हज़ार बैठक और तीस बार रस्सा चढ़ लिया तो गालियाँ पड़ती , नालायक तेरे से कुछ न बन पड़ेगा , इधर और ज्यादा करने के चक्कर में शाम ६ बजे तक चित्त होकर खाट पकडनी पड़ती। कहाँ से देखते आखिर ज्ञान की धारा तो प्राइम टाइम या उसके बाद ही बहती है। और पहलवानी में ब्रह्मचारी होना लाजमी है , सो भय इतना की हर लड़की में बहन ही दीखती , हाँ अगर हिंदी फ़िल्में देखते तो सुबह-२ बालों में कंघा लगा कर मोटर साईकिल लेकर किसी लड़की के घर के नीचे न खड़े हुए होते ? दोस्तों से उधर मांगते या माँ बाप से किसी न किसी बहाने रूपये मांग कर उनका मोबाइल बिल भरते। अपनी किस्मत में ऐसा कुछ न रहा। दिन भर पार्कों में आजकल बच्चे क्या क्या शिक्षाप्रद बातें करते हैं हमसे न हो सकी , क्योंकि जो सुबह चार बजे पार्क में पसीना बहा कर सात बजे लौट आये वो दिन में वहां फिर क्या करने जाएगा अंदाजा न था , हिंदी फिल्मों की शिक्षा ग्रहण करता तो पता चलता। खैर इधर अपने पडोसी की लड़की बड़ी हिंदी फिल्मे देखा करती , मां बाप उसके और पडोसी लड़के के बीच उन्हें विलन नज़र आने लगे , अब उनके मोबाइलओ में शिक्षाप्रद गाने बजा करते "मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए " या फिर "भीगे होंठ तेरे .." और भी न जाने क्या क्या ? ज्ञान अंतहीन है , उसका संग्रह और दर्शन आपके जीवन की दिशा निर्धारित करता है। आपके चारों और का वातावरण आपको प्रेरणा देता है , इधर फ़िल्मी हेरोइन हीरो के साथ भागी नहीं की पडोसी की लड़की ने भी बैग बाँधा और पडोसी के लड़के के साथ भाग खड़ी हुई, समस्या हमारी , ढूंढें हम। और पकडे जाने पर हमारी किरकरी। क्या आपने कभी प्यार किया है ? सवाल हुआ ; आपको क्या मालूम माँ बाप हमें प्यार नहीं करते , फलां लड़का प्यार करता है , कोर्ट मैरिज कर चुके हैं क़ानून हमारे साथ हैं इत्यादि -२। भाई शादी तो हम भी कर चुके मैंने उनसे कहा। मां बाप ने लड़की ढूंढी , और ये लो जी घोड़े पर बैठे और डोली ले आये ,पर क्या मजा आया महीनों दिल्ली भर के पार्कों की शोभा तो न बढ़ा पाए । इनकी शिक्षा प्रद कहानी सुनकर आज घरवाली से कहने को जी हुआ सुनो जी कल बस स्टैंड पर सज धज कर आ जाना ,में भी बालों में कंघी लगा कर जींस पहन कर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा किसी पार्क में बैठेंगे , एक फिल्म देखेंगे , और फिर आइसक्रीम खायेंगे , तो महारानी बोली पगला गए हो , बच्चे कहाँ रहेंगे ? पार्क में बाते क्या करेंगे, मैंने तो बता ही दिया है की परसों मायके जाना है साडी और सूट तो मैं ले ही आई हूँ , सिलाई देनी है तो यहीं देदों और हाँ अकेले ही खाओगे मम्मी पापा को पता चलेगा तो क्या कहेंगे ? वगैरा -२; सुनकर जवाब न बना , अपना तो वक्त ही चला गया , हिंदी फ़िल्में देखि होती तो ये अनुभव भी हुआ होता मां बाप से शहजादा सलीम बनकर बहस बाजी करते। खैर अब इधर कुछ अरसा पडोसी की बेटी की शादी हुए गुजरा तो मालूम पड़ा हिंदी फिल्मों मे शादी के बाद की कहानी ही नहीं होती , हिंदी फिल्मों का ज्ञान-दर्शन तो बस शादी पर ही ख़तम हो जाता हे , लड़के ने जो टाइम हिंदी फिल्मों की प्रेरणा स्वरुप लडकी की खिड़की के नीचे लगाया उसका परिणाम ये हुआ की कमाई के लाले पड़ गये , घर तो पहले ही छोड़ना पड़ा था किराए के छोटे मकान में ठीक से गुजर बसर न हो रही थी , सो लड़की मेरे पास आई कहती इन्हें नौकरी लगा दो मैंने जानबूझ कर पुछा क्या कर लेता है , हालांकि मुझे तो पता ही था। किसी तरह एक कम्पनी में चपरासी लगाया तो रोजी रोटी चली , उन्हें याद कर रहा हूँ , इधर कोई आशिक रेडिओ पर गाने सुन रहा है ... मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में ...इधर मुझे भी समझ आ रहा है। ठीक रहे गुरु जी के डंडे और झिडकियां खाई सो खाई बच्चे चैन से सो रहे हैं
Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)
मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह गया, जी हाँ, ये एक हिंदी फिल्म का गाना है , जो मुझ नाचीज़ पर फिट बैठता है। हिंदी फिल्मो में सब कुछ है या यूँ कहूं तो जीवन जीने की कला हिंदी फ़िल्में बेहतर सिखाती है। मेरे एक दोस्त को तो इतना फोबिया हुआ की वो निरूपा राय को ही अपनी माँ मानता था और असली माँ को ललिता पंवार। एक दोस्त तो खाते पीते , सोते उठते बस कुछ रटे -२ डायलॉग ही बोलता रहता था मसलन " हम जहाँ खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीँ से शुरू होती है , हांय !" या " जली को आग कहते हैं बुझी को राख कहते हैं ...जिस आग से बारूद बने उसे विश्वनाथ कहते हैं।" ये फ़िल्मी डायलाग भी पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते रहते हैं, एक बुजुर्ग से पूछ लिया कोई हिंदी फिल्म का डायलाग सुनाओ तो मुगले आजम सुनाने को झटपट तैयार हो गये लो जी " हमारा हिन्दुस्तान कोई तुम्हारा दिल नहीं एक लोंडी जिसकी मलिका बने ..तो सलीम कहता है "मेरा दिल भी कोई कोई आपका हिन्दुस्तान नहीं जिस पर आप हुकूमत करें।" अब मुझे समझ आया बीज तो इन बुड्ढों के जमाने में ही बोये गए थे। अगर आज सलमान खान गाता है की " इश्क के नाम पर करते सब रास लीला है , मै करूं तो साला करैक्टर ढीला है" तो हरगिज़ नाइंसाफी नहीं। तो मेरे कोरे जीवन की बातें हो रहीं थी , कोरा यूँ की हिंदी फिल्मे ज्यादा नहीं देख पाया , गुरु जी पूछते कितने दंड पेले , कितनी बैठक लगाईं, कितने रस्से चढ़ लिए , तो जवाब मिलता ३ हज़ार दंड, २ हज़ार बैठक और तीस बार रस्सा चढ़ लिया तो गालियाँ पड़ती , नालायक तेरे से कुछ न बन पड़ेगा , इधर और ज्यादा करने के चक्कर में शाम ६ बजे तक चित्त होकर खाट पकडनी पड़ती। कहाँ से देखते आखिर ज्ञान की धारा तो प्राइम टाइम या उसके बाद ही बहती है। और पहलवानी में ब्रह्मचारी होना लाजमी है , सो भय इतना की हर लड़की में बहन ही दीखती , हाँ अगर हिंदी फ़िल्में देखते तो सुबह-२ बालों में कंघा लगा कर मोटर साईकिल लेकर किसी लड़की के घर के नीचे न खड़े हुए होते ? दोस्तों से उधर मांगते या माँ बाप से किसी न किसी बहाने रूपये मांग कर उनका मोबाइल बिल भरते। अपनी किस्मत में ऐसा कुछ न रहा। दिन भर पार्कों में आजकल बच्चे क्या क्या शिक्षाप्रद बातें करते हैं हमसे न हो सकी , क्योंकि जो सुबह चार बजे पार्क में पसीना बहा कर सात बजे लौट आये वो दिन में वहां फिर क्या करने जाएगा अंदाजा न था , हिंदी फिल्मों की शिक्षा ग्रहण करता तो पता चलता। खैर इधर अपने पडोसी की लड़की बड़ी हिंदी फिल्मे देखा करती , मां बाप उसके और पडोसी लड़के के बीच उन्हें विलन नज़र आने लगे , अब उनके मोबाइलओ में शिक्षाप्रद गाने बजा करते "मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए " या फिर "भीगे होंठ तेरे .." और भी न जाने क्या क्या ? ज्ञान अंतहीन है , उसका संग्रह और दर्शन आपके जीवन की दिशा निर्धारित करता है। आपके चारों और का वातावरण आपको प्रेरणा देता है , इधर फ़िल्मी हेरोइन हीरो के साथ भागी नहीं की पडोसी की लड़की ने भी बैग बाँधा और पडोसी के लड़के के साथ भाग खड़ी हुई, समस्या हमारी , ढूंढें हम। और पकडे जाने पर हमारी किरकरी। क्या आपने कभी प्यार किया है ? सवाल हुआ ; आपको क्या मालूम माँ बाप हमें प्यार नहीं करते , फलां लड़का प्यार करता है , कोर्ट मैरिज कर चुके हैं क़ानून हमारे साथ हैं इत्यादि -२। भाई शादी तो हम भी कर चुके मैंने उनसे कहा। मां बाप ने लड़की ढूंढी , और ये लो जी घोड़े पर बैठे और डोली ले आये ,पर क्या मजा आया महीनों दिल्ली भर के पार्कों की शोभा तो न बढ़ा पाए । इनकी शिक्षा प्रद कहानी सुनकर आज घरवाली से कहने को जी हुआ सुनो जी कल बस स्टैंड पर सज धज कर आ जाना ,में भी बालों में कंघी लगा कर जींस पहन कर तुम्हारा इंतज़ार करूंगा किसी पार्क में बैठेंगे , एक फिल्म देखेंगे , और फिर आइसक्रीम खायेंगे , तो महारानी बोली पगला गए हो , बच्चे कहाँ रहेंगे ? पार्क में बाते क्या करेंगे, मैंने तो बता ही दिया है की परसों मायके जाना है साडी और सूट तो मैं ले ही आई हूँ , सिलाई देनी है तो यहीं देदों और हाँ अकेले ही खाओगे मम्मी पापा को पता चलेगा तो क्या कहेंगे ? वगैरा -२; सुनकर जवाब न बना , अपना तो वक्त ही चला गया , हिंदी फ़िल्में देखि होती तो ये अनुभव भी हुआ होता मां बाप से शहजादा सलीम बनकर बहस बाजी करते। खैर अब इधर कुछ अरसा पडोसी की बेटी की शादी हुए गुजरा तो मालूम पड़ा हिंदी फिल्मों मे शादी के बाद की कहानी ही नहीं होती , हिंदी फिल्मों का ज्ञान-दर्शन तो बस शादी पर ही ख़तम हो जाता हे , लड़के ने जो टाइम हिंदी फिल्मों की प्रेरणा स्वरुप लडकी की खिड़की के नीचे लगाया उसका परिणाम ये हुआ की कमाई के लाले पड़ गये , घर तो पहले ही छोड़ना पड़ा था किराए के छोटे मकान में ठीक से गुजर बसर न हो रही थी , सो लड़की मेरे पास आई कहती इन्हें नौकरी लगा दो मैंने जानबूझ कर पुछा क्या कर लेता है , हालांकि मुझे तो पता ही था। किसी तरह एक कम्पनी में चपरासी लगाया तो रोजी रोटी चली , उन्हें याद कर रहा हूँ , इधर कोई आशिक रेडिओ पर गाने सुन रहा है ... मैं दुनिया भुला दूंगा तेरी चाहत में ...इधर मुझे भी समझ आ रहा है। ठीक रहे गुरु जी के डंडे और झिडकियां खाई सो खाई बच्चे चैन से सो रहे हैं
Thanks,
Pahalwan ji
( Deepak A.P.)
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