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Thursday, April 4, 2013

फिर काली बदरिया छाई ..




फिर काली बदरिया छाई ..
संग पूर्वा बहा लायी ..
कहीं पीर विरह की जगी ..
कहीं पीर अंगो में ..
निंद्रा से जाग आई ..


फिर से सुगंध, मृत्तिका भर लायी ..
दीवानों से मुरझाये पातों पर ..
फिर से प्रीत, उमंग बन भर आई ..
बिन ब्याही धरा,  प्रसूता भयी ..
नन्ही कोपलें, ले अंगडाई ..

कहीं गरजी, कही बरसी
क्यूँ यौवना क्रोध में आई ..
कहीं गुबार में बूँदें गिरीं ..
कहीं ओलावृष्टि गिराई ...

फिर बूंदों ने घूँघरू पहने ..
फिर शाखाओं ने ठाप दी .
लूकछुप कोयल गीत गुनगुनायी ..
काले बदरवा, कोयल काली ..
घूंघट कोयल छोड़ आई ..
बेसुध डाल२ डोली वो ...
लाज शर्म तज आई ..

खुद विरहन रही बदरिया ..
विचरण करे आकाश ..
खींच लकीर इन्द्रधनुषी ..
दो प्रेमियों को मिला आई ...

फिर से काली बदरिया छाई ....रामेश्वरीं 


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