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Tuesday, April 23, 2013






समझो ना ..
वीरानियाँ छाई हैं ..
गिरे पीले पात हैं, मगर !..
सन्नाटे में कहीं ना कहीं ..
यादों की बारात है ...
छूने एहसास मेरे ..
तेरी यादें आई हैं ...
 धुंधली हवाओं ने 
यादें धुंधली करायी हैं ..
पर यहीं कहीं, लुक्का छुपी ..
खेल रही तेरी परछाई हैं .. 

कभी गूंजती थी स्वरलहरी ..
आज यहाँ वीराना है .
निसदिन ख़ामोशियों का आना जाना है ..

आज पड़ी धरातल ..
काठ के ठूंठ की तरह,  उम्मीद हमारी..
पर आज भी ..
ये मेज हमें  बुलाता  ..
सूखे  झड़ चुके पातों से..
खुद का सौन्दर्य बढाता ....
धीमे से पुकारता ..
ए राही जब गुजरना इन राहो से ..
थोडा ले सहारा मेरा सुस्ता लेना ..
भूल चुके जो लम्हें बीते संग मेरे ..
उनकी थाह लेना ..
पा सुकून, फिर अपनी राह लेना ..
ये आज भी तुम्हारे प्रेम की महक ..
संजोये रखता है ...
ये बैठा एकांत वीराने में ..
आज भी दामन अपना खाली रखता है ... रामेश्वरी  



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