आ ..
सुरमई बादलों को ..
चोंच से अपनी चीरते हैं ..
आ, तरसते कंठ सींचते हैं ..
अथाह नीर गर्भ रखे ..
जाने क्यूँ, किस और दौड़ते हैं ?
जाने किस पर ये खीजते हैं ..
आ ..
संग नृत्य करें ..
कोमल पंख फैलाएं ..
नीलाभ नभ में ..
अपूर्व दृश्य रचायें ..
इस स्वार्थी लोक से दूर ..
अपना नव त्रिदिव सजायें ..
आ ..
उड़ चले ..
उस दिशा की ओर ..
जिस ओर स्नेह दरिया बहे ...
ना स्वार्थी मानुष हो जहाँ ..
ना रक्त का दरिया बहे ..
आ ..क्षितिज तक उड़ान भर आयें ..
धरती आकाश मिले कैसे वहां ?
प्रेम का वो सबक पढ़ आयें ..
(रामेश्वरी )
' तस्वीर क्या बोले" समूह में मेरे कुछ शब्द….
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