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Monday, April 29, 2013

सौम्य, पावन  हृदया तू ....
पुरुष जीवन का मान सम्मान तू ..
कोमल तन ..
कोमल मन सही ..
यम से हर ले प्राण तू।
उज्जवल रूप रंग ..
हाड मॉस का लोथड़ा भर नहीं तू ..
क्यूँ वहशी गिद्ध निगाह गाड़े खड़े ?.
लज्जा रहती है जिन नैनो में ..
उन नैनो मैं तेज़ाब भर तू ...
अब दौर नहीं घूंघट का ..
छोड़ दामन पनघट का ..
नीर बहुत बहा चुकी तू ..
कल्पना का आकाश, राह ताके तेरी ..
उन्मुक्त, स्वछंद उड़ान भर तू ...
बहेलिये खड़े जो, गर राह हो तेरी ..
जो समझे ना तेरी ह्रदय पीर ..
लोह भर ह्रदय,  हाथों में उठा शमशीर ..
जीवन रणभूमि मान तू ..
अपनों में, गैरों में ..
दुश्मन को पहचान तू ....
(रामेश्वरी)








 



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