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Sunday, December 25, 2011


संसार के सारे बंधन तोड़...
मिले हैं जब हम तुम..
अब कैसे कहते हो..?...
आओ इक बंधन में...
इक रिश्ते में बंध जाएँ हम ....


प्यार के दरिया के नाविक हैं हम...
अब कैसे कहते हो..?...
इस नाव को पार भी लगाएं हम....


प्यार एक  आग का दरिया है..
जल जल ही इसे  पाते हैं..
अब कैसे कहते हो?
दामन इस जवाला से बचाएं हम.....


ये कनक है वो..
जो अग्नि से गल गल निखरा है..
ये इश्वर के पसीने की ओंस है..
जो हम सभी में भरने को ...
इश्वर ने इस धरा पर बिखेरा है.....
अब कैसे कहते हो?
इस धरा पर,  ओंस पर पैदल ...
न चला करें हम...............रामेश्वरी 

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