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Friday, December 30, 2011


मैं सहरा तू सागर.... 
तू नदिया मैं गागर...
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
तुझमे मैं समाऊँ तो कैसे ?.....
मैं इक छोटी चिंगारी..
तू विशाल आसमां ....
इतने तारों में...
अब बता तू ही ऐ-खुदा...
जगह बनाऊं तो बनाऊं कैसे...?
मैं श्रृंगार, तू माला है मोती भरा हार...
श्रृंगार करूं कैसे.....
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
तेरी माला मैं अपनी चमक पाऊँ कैसे?
मैं फूल तू बाग़ है भरा फूलों का....
काँटों  भरा.....
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
इन काँटों से दामन अपना बचाऊँ कैसे?
मैं किनारा तू दरिया........
साथ२ बहूँ तेरे...
अब बता तू ही ऐ- खुदा .....
महासागर से तेरा मिलन करूं कैसे?
मैं साध्हिका तू बने अपने को खुदा ..
अब बता तू ही ऐ- खुदा .
इस अहंकारी के आगे मस्तक झुकाऊँ कैसे?........
मैं सूखी झाड, तू बेला ऐ बहार ...
इस सूखे गुलशन में..
अब बता तू ही ऐ- खुदा ....
मैं भी बेला ऐ बहार खिलाऊँ कैसे?
मैं ईमान तू ईमान की दूकान ...
इस बेरहम दुनिया में..
अब बता तू ही ऐ- खुदा ....
अपना ईमान बिकाऊँ  किसे?
मैं सत्या तू असत्य  ...
दबाना चाहे आवाज़ हर असत्य  मेरी ...
अब बता तू ही ऐ- खुदा ....
गला दबा मेरा.....
सत्य क्या है का शोर मचाऊँ कैसे ?
.(रामेश्वरी )

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