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Monday, December 5, 2011

लेके सपने वो सुनहरे बड़े शहर आते हैं..
मधुर आकांशाओं के गीत वो गाते हैं...

सर्द बड़ी रातों में ठिठुरता तन लिए..
जीने की उमंग लगन वो मन में लिए...
चौराहों में सोये नज़र आते हैं....

सब्जी वाले भाई...ओ रिक्शे वाले भाई..
भाई भाई सब उसे पुकारे...
पर भाईचारा उससे कहाँ निभाते हैं..

आओ इतना सा ही भाईचारा निभाते हैं..
किसी ठिठूरती देह को इक कम्बल ओड़ाते हैं...

कभी लावारिस सा गाड़ी के नीचे..
कभी किसी पुलिया के नीचे..
रोज उसके चर्चे अखबार में नज़र आते हैं....

बड़े शहरों में बनाने आशियाना देखो ना...
कब ज़िन्दगी उनकी कट जाती है...
बने गर आशियाना ऐ खुदा तब उनकी उम्र ...
रहने उस आशियाने में कहा बच पाती है....

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