बन्दों से अब बंदगी कहाँ होती है....
हाँ, गंद हैं समाज का ...
गंदगी अब हर कोने में होती है...
पाप करने से डरता कौन है...
जब गंगा पावन अभी बहती है ....
पीने को लहू भाई का है अभी...
पीने वाले कहाँ अभी जल पीते हैं.....
इमानदारी शरमा रही समाज में..
जब छल कपटी खुले घूमते हैं.....रामेश्वरी
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