कंक्रीट के जंगलों में..
इक जीव ऐसा पाया जाता है...
जो लुप्त प्राणी तो नहीं...
पर चुनावों पर बड़ा कीमत बनाया जाता है....
दवा महंगी दारु सस्ती है उसके लिए..
लीपा पोती का दाम सस्ता कर..
कभी बीच सड़क, कभी पार्टी में चेहरा..
उसका रंगा जाता है..
नमक सस्ता कर जैसे घावों पर छिड़का जाता है...
अब मरने भी नहीं देते, जिन्दा हैं वोट के लिए ..
जब तेल, ज़हर, पंखा, दवा महंगी कर ..
उन्हें जिंदा रखा जाता है..
बस कूदो अब ऊंचाई से...
तंग हो गर महंगाई से...
रामेश्वरी...
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