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Monday, March 5, 2012

baanke bihari

तुम कहे जाते हर पल, बिहारी ..
श्रम से तुम्हारे, दुनिया है हारी..
हैरान हूँ देख, क्यूँ परेशां दुनिया तुमसे ..
देखि हर पल मुस्कुराती सूरत तुम्हारी ..
जैसे हर परेशानी भी तुमसे है हारी ..
हम भूल गए मुस्कुराना, महंगाई की मार से ..
बैठे तुम आज भी, संग साथियों के इक तार से ..
सुबह होती ऊँची हंसी से तुम्हारी ..
व्यर्थ ये सुइयां घड़ी की हमारी ...
खिलखिला कर मोहल्ला जगाते तुम..
जिंदादिली से ह्रदय मेरे सम्मान पाते तुम..
फिर भी जाने क्यूँ ईश्वर, इन्हें दुत्क्कारते तुम..
इक पल को नारी भी थक हार जाती है..
कह देती हिम्मत नहीं आज रसोई की हमारी है..
जोड़ने तिनका२ घरोंदे का, इक इक सिक्का बचाते तुम..
थकान भूल इस तन मन की, रसोई खुद बनाते तुम..
यह ढृढ़-इच्छाशक्ति कहाँ से पाते तुम..
तंग कमरों में. खुले हृदय द्वार हैं तुम्हारे ..
(रामेश्वरी)
(मैं बिहार के निवासियों को इतना खुश देखकर बहुत हैरान होती हूँ कभी२, कि उसी दुनिया में हम रहते हैं और वह भी उसी दुनिया में हैं...पर वो इतने खुश क्यूँ रहते हैं)

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